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________________ ८५२ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि तस्याः किल समुद्धाहे सुरराजेन नोदिताः । सुरोत्तमा महाभूत्या चक्र : कल्यास कौतुकम् ।।१६३०॥ इससे सिद्ध होता है कि वे घुगलिया नहीं थे, किन्तु उनका विवाह हुआ था। यहां कोई प्रश्न करे किस बुगलिया स्त्री से विवाह हुआ था ? किसी की स्त्री से विवाह नहीं सुना था किंतु कन्या से हुआ था । इसका भी कारण यह है कि तेरहवें कुलकर के ही समय से युगलिया होना बन्द हो गया था । अर्थात् तेरहवें कुलकर के सामने ही जुदे-जुटे पुत्र-पुत्री होने लगे थे। तब उसके पिता अमितमति ने विवाह करने की रीति चलाई। इससे सिद्ध होता है कि नाभिराजा और मरुदेवी अलग-अलग जन्मे थे और उनका विवाह हुआ था । सिद्धान्तसार दीपक में लिखा है कल्पाष्ट लक्ष कोटयैकभागे बर्ते मे तसः । प्रियगुकांतिमत्कायो जज्ञे भनुः प्रसेनजित् ।।१८३१॥ ............स्तस्यामितगतिः पिता । वर कन्यकया साद्ध विवाहो विधिना व्यधात् ॥१८३२॥ कुलवृद्धि करायत्रोत्पन्नः स युगलं विना । तदा प्रभृतिः युग्मानामुत्पन्नो नियम गतः ॥१८३३॥ इससे सिद्ध होता है कि तेरहवें कुलकर के समय में ही पुत्री पुत्र अलग-अलग होने लगे थे और इन्द्र ने उनका विवाह किया था उस समय कुलकरों के सिवाय सबका नाम आर्य था ! इसीलिये मरुदेवी के पिता का नाम नहीं लिखा है। प्रश्न--युग के प्रारम्भ में अर्थात् कर्मभूमि या चतुर्थकाल के प्रारम्भ में अयोध्या की रचना किसने की थी ? उत्तर-श्री ऋषभदेव के गर्भ में पाने के पहले अयोध्या नगरी की रचना इन्द्र ने की थी तथा. और अन्य जगह के रहने वाले पुरुषों को बुलाबुलाकर वहां बसाया था । सो ही महापुराण में लिखा है-- इतस्ततश्च विक्षिप्तान अनीयानीय मानवान् । पुरी निवेष यामा सुविन्यासविविधैः सुराः ।।१८३४।। .. इससे सिद्ध होता है, अयोध्यापुरी की रचना युग के प्रादि. में इन्द्र ने . RA-मा TORS nine SINESS MARATHI
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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