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अध्याय : दसवां ।
[ ८८१ मानसिक पाप से (हिसा किये बिना ही) वह सात नरक जाता है जो उसको बाह्य हिंसा करने के बिना ही पाप किस प्रकार लग
जाता है ?
उत्तर--तुम्हारा कहना तब सत्य हो सकता है जब कि पाप केवल शरीर से ही लगते हों परन्तु पाप तो मन वचन काय तीनों योगों से बराबर लगते हैं, मोक्षशास्त्र में लिखा है, "प्रमत्त योगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा' अर्थात् कषायों के उत्पन्न होने पर प्रारणों का व्यपरोपण व घात होना हिसा है । इसी वचन के अनुसार उसे सातवें नरक में जाना पड़ा। इसी सूत्र की श्रुत सागरी टीका में एक श्लोक भी लिखा है.--. . .
स्वमेवात्मनात्मानं हिनस्त्यात्मा कषायवान् । पर्व प्राण्यन्तराणां तु पश्चात्स्यावा नवा वयः ॥१५२६।।
अर्थात्-कषाय करने वाला आत्मा अपने कषाय से पहले तो अपने प्रात्मा की हिंसा करता है क्रोधादिक कषाय के द्वारा अपने प्रात्मा के गुणों का घात करता है । उस अपनी हिंसा के बाद जिसकी हिंसा बन्द करना चाहता है उसको हिंसा हो भी जाय अथवा उसके तीन पुण्य से न भी हो तथापि अपने प्रात्मा की हिंसा करने के पाप से जो कर्म बंध होता है उसके फल से नरक जाना पड़ता है। यही कारण है कि सालिसिथ नाम का मत्स्य दूससे की हिंसा किये बिना ही केवल मानसिक पाप के फल से नरक जाता है । मानसिक पाप का ऐसा ही महात्म्य है, इसलिये भव्य जीवों को चाहिये कि वे मन के संकल्पं विकल्पों से उत्पन्न होने वाले व्यर्थ के पापों से सदा बचते रहें । उसी श्रुतसागरी टीका में और भी लिखा है---
अघ्नन्नपि भवेत्पापी ननन्नपि न पापभाक् ।
परिणाम विशेषेण यथा धोवरकर्षकौ ॥१८२६।। . इससे सिद्ध होता है कि कर्मबन्ध का मुख्य कारण जीवों के परिणाम ही हैं। प्रश्न- चौदहवें कुलकर राजा नाभिराय की रानी मरुदेवी का विवाह हा
था कि नहीं? . . .. ... ....... .. .. .. . - उत्तर--राजा नाभिराय और राती मरुदेवी का विवाह इन्द्र ने किया है सो ही महापुराण के बारहवें अधिकार में लिखा है