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[ गो. प्र. चिन्तामरिण . इस प्रकार जिनागम में लिखा गया है. ...
जो जीय केवल नख, केश रहित सिद्धों की अवगाहना मानते हैं, सो भ्रम है। इसलिये ऊपर लिखे अनुसार श्रद्धान करना योग्य है। प्रश्न :--भगवान तीर्थकर जब गर्भ में प्राते हैं, उस दिन से छह महीने
बाद ही जन्म होने के तक अर्थात् पंद्रह महीने तक कुबेर इन्द्र की प्राज्ञा से रत्नों को वर्षा करता है । सो प्रतिदिन कितनी बार
करता है और कौन-कौन समय करता है ? उत्तर :-- वह रत्नों की वर्षा भगवान के माता पिता के घर चार बार होती हैं, सवेरे, दोपहर को, सायंकाल को और आधि रात के समय । तथा एक-एक बार में साढ़े तीन करोड़ रत्नों की वर्षा होती है। इस प्रकार पंद्रह महीने तक बराबर होती रहती है । सो ही लिखा है
पुत्वण्हे मन्झण्हे अवरव्हे मज्झिमायरयणीये। प्राठ्ठय कोडीओ रयणाणं घरिसेऊ ॥१८२६॥ .. इस प्रकार प्रतिदिन चारों समय में चौदह करोड़ रत्न बरसते हैं । प्रश्न -- केवली भगवान की दिव्यध्वनि नियम से तीन बार खिरतो है, ऐसा ... सुनते हैं, सो क्या ये बात ठीक है ?
उत्तर---केवली भगवान की दिव्यध्वनि प्रतिदिन चार बार खिरती है । प्रातःकाल, मध्यान्हकाल, सायंकाल और अर्द्धरात्रि इन चारों समय में छह-छह घड़ी तक दिव्यध्वनि खिरती है। इन चार समय के सिवाय पदवीधर और महापुण्यवान पुरुषों के प्रश्न पर दूसरे समय भी खिरती है ! इससे सिद्ध होता है कि चार समय तो नियम से खिरती है तथा इनके सिवाय भी यथेष्ट कारण मिलने पर खिरती है सो हो लिखा है--- . . . . . . . . .
पुष्यण्हे माझण्हे अबरण्हे मज्झमाय रयणीये । अस्छ घड़ीये रिणमाइ दिव्यधुली जिगारिदारणं ।।१८२७॥ प्रश्न-स्वयंभूरमरण समुद्र में रहने वाला सलिसिथ नाम का मत्स्य अपने
शरीर से तो कुछ हिंसा प्रादि पाप करता ही नहीं है । केवल हिंसा करने के पाप को मन से चिन्तवन करता रहता है और उसी