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________________ अध्याय : दसवाँ । रूपामयदीपकनि करि पूजन करें हैं तथा सचिक्करण द्रव्यनिके केसर के रङ्गादित दीप का संकल्प करि पूजन करै हैं तथा चन्दन अगरादिक क चढ़ावे हैं तथा बादाम, जायफल, पूगीफलादिक अवधि शुद्ध प्रासुक फलनित - पूजन करें हैं एस तो.अचित्त द्रव्यनि करि पूजन करै हैं। बहुरी जे सचित्त. द्रध्यनि तें पूजन करें हैं ते जल गन्ध अक्षतादि उज्वल द्रव्यनि करि पूजन करें हैं अर चमेली चंपक, कपक, कमल, सोन जाई इत्यादिक सचित्त पुष्पनि से पूजन कर हैं, घृत का दीपक तथा कपूरादिक दापनि करि प्रारति उलार हैं अर सचित्त आम्र, केला, दाडिमादिक फल करि पूजन कर हैं धूपार्थान में धूपदहन करै हैं एसे हैं सचित्त द्रव्वनि करि हूं पूजन करिये हैं । दोऊ प्रकार प्रागम की आज्ञा प्रमाण सत्तातनमार्ग है, अपने भावनिके प्राधीन पुण्य बन्ध के कारण हैं। रत्न करंड श्रावकर. टीका. पं. सदासुखजी, श्लोक नं. ११६ प्रश्न :--सिद्ध परमेष्ठि की अवगाहना अंतिम शरीर से कुछ कम बतलाई ! है सो कितनी कम होती है ? . . . उत्तर :--जिस शरीर से केवली भगवान मुक्त होते हैं उसका तीसरा भाग कम हो जाता है । दो भाग प्रमाण सिद्धों की अवगाहना होती है जैसे तीन धनुष के वाले मनुष्य की अवगाहन सिद्ध अवस्था में जाकर दो धनुष की अवगाहना के समान रह जाती है । सो ही सिद्धांत सार प्रदीपक में लिखा है--- गतसिस्थायमूषायां प्राकाशाकार धारिणः । प्राक्कायायाम विस्तार विभागो न प्रदेशकाः ॥१८२२॥ लोकोत्तमशरण्याश्च विश्वमंगलकारकाः । अनंतकाल मात्मानो तिष्ठन्त्यंतातियाः सदा ॥१८२३॥ इशे सिद्धा मया ध्येया बंद्या विश्वमुनीश्वरैः । . स्तुताश्च मम कर्वन्तु स्वर्गात स्वपुरसैः समम् ॥१८२४।। त्रिलोक प्रज्ञप्ति में भी लिखा है---- देहे भावा हाल चरमभवे जस्स जारि संठाएं। तत्तो तिभागहीणं नुग्गहरसा सव्वसिद्धाणं ।।१८२५॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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