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[ गहे. प्र. चिन्तामणि जिनेन्द को चढावै हैं कोई रोटी चढावें हैं, केई रावड़ी चढाव है, केई अपनी बाडीत पुष्प ल्याय चहावै हैं केई नाना प्रकार के हरित फल चढाचे है केई दाल भात अनेक व्यंजन चढवे हैं । केई नाना मेवा चढ़ाव हैं। कई मोतीनिके अक्षत माणिक निके दीपक सुवर्ण रूपानिक तथा पंच प्रकार रत्ननिकरि जड़े पुष्प फलादि चढावै हैं केई दुग्ध केई दही कई घृत चढाव हैं । केई नाना प्रकार के घेवर, ला, पेड़ा, बरफी, पूड़ी, पूर्वा इत्यादिक चढावे हैं । केई वदना मात्र ही करें हैं, केई स्तवन गीत नृत्य वादित्र ही करें हैं । केई अस्पयेशूद्रादिक मन्दिर के बाह्य ही रहि मन्दिर के शिखर की तथा शिखरनि में जिनेन्द्र के पतिदिन का ही दर्णन बन्दना करें हैं।
एस जैसा ज्ञान जैसी संगति जैसी सामर्थ्य जैसी धन सम्पदा जैसी शक्ति तिस प्रमाण देशकाल के योग्य जिनेन्द्र का आराधक अनेक मनुष्य हैं । ते वीतराग का दर्शन स्तवन पूजन बन्दनाकरि भावनि के अनुकूल उत्तम मध्यम जघन्य पुण्य का उपार्जन करें हैं । यो जिनेन्द्र का धर्म जाति कुल के आधीन नाहीं, वन सम्पदा के आधीन नाहीं बाह्य क्रिया के आधीन नाहीं हैं, बाह्य क्रिया के प्राधीन नाहीं है । अपने परिणामनिकी विशुद्धता के अनुकूल फल है । कोऊ धनाढय पुरुष अभिमानी होय यश का इच्छुक होय मोतीनि के अक्षत मारिणकानि के दीपक रत्नसुवर्ण के पुष्प निकरि पूजन कर हैं अनेक वादित्र नृत्यगान करि बड़ी प्रभावना करै हैं तोहू अल्प पुण्य उपार्जन करै वा अल्प हू नाहीं करै केवल कर्म का बन्ध ही करै हैं कषायनि के अनुकूल बन्ध होय है । केई अपने भावनि की विशुद्धतात अति भक्ति रूप हुआ कोऊ एक जल फलादिक करि या अन्तमात्र करि वा स्तवन मात्र करि महापुण्य उपार्जन करै हैं तथा अनेक भवनि के संचय किये पाप कर्म की निर्जरा करै हैं, धनकरि पुण्य मोल नाहीं आवे हैं। जे निर्वाछिक है मन्दकषायी, ख्याति लाभ पूजादिक कू नाहीं बांछा करता केवल परमेष्ठी का गुणों में अनुरागी हैं तिनके जिनपूजन अतिशय रूप फलकू फले हैं।
अब यहां जिन पूजन सचित्त द्रव्यनि लें. हु पर अचित्त द्रव्यान ते ह पागम में क ह्या है, जे सचित्त के दोषतें भयभीत हैं, यत्नाचारी हैं, ते तो प्रासुक जल गन्ध अक्षत कू चन्दन कुकुमादिक तें लिप्त करि सुगंध रङ्गीन में पुष्पनिका संकल्प. करि पुष्पनि त पूजे हैं तथा पागम में कहे सुवर्ण के पुष्प वा रूपा के पुष्प तथा रत्न, जडित सुवर्ग के पुष्प तथा लवंगादिक अनेक मनोहर पुष्पनि करि पूजन करें हैं अरु प्रासुक ही बहुं प्रारम्भादिक रहित प्रमाणीक नैवेद्य करि पूजन कर हैं । बहुरि रत्ननि के दीपक वा सुवर्ण ।
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