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अध्याय : दसया ।
[८७७ अहिसेयफलेण एरो हिसिधिज्जइ सुदंशरणस्सुरि। . . ... खीरोय जलेण सुरिंदप्पमुह देहि भत्तोए ॥१८१६॥
जिन भगवान के अभिषेक करने के फल से मनुष्य सुदर्शन मेरु के उपर क्षीरसागर के जल से सुरेन्द्र प्रमुख देवों के द्वारा भक्ति के साथ अभिषिक्त किया जाता
विजय पडाएहि गरो संगाम मुहेतु विजइयो होइ। छक्खंड विजयरसाहो गिप्पडिवक्खो जसस्सो ॥१८२०॥
जिन मंदिर में विजयपताकाओं के देने से मनुष्य संग्राम के मध्य विजयी होता है । तथा षट् खण्डरूप भारत. वर्ष का निष्प्रतिपक्ष स्वामी और यशस्वी होता है।
कि अंपिएक बहुरणा तीसु वि लोएसु कि पि जं सोक्खं । पूजा फलेग सवं पाधिज्जइ खस्थि संवेहो ॥१८२१॥
अधिक कहने से क्या लाभ है ? तीनों ही लोकों में जो कुछ भी सुख है। वह सब पूजा के फल से प्राप्त होता है इसमें कोई संदेह नहीं है।
यहां ऐसा विशेष और जानना जो जिनेन्द्र के पूजन से समस्त च्यार प्रकार के देव तो कल्प वृक्षतितै उपजे गन्ध, पुष्प, फलादि सामग्री करि पूजन करै है अर सौधर्म इन्द्रादिक सम्यग्दृष्टि देव हैं, ते तो जिनेन्द्र की भक्ति पूजन स्तवन करके ही अपनी देव पर्याय कू सफल माने पर मनुष्यनि में चक्रवर्ती नारायण बल भद्रादिक राजेंद्र हैं हैं, ते मोतीनिके प्रक्षत रत्ननिके पुष्प फल दीपकादिक तथा अमृत पिंडादिकरि जिनेन्द्र का पूजन स्तवन नृत्य गानादिककरि महापुण्य उपार्जन कर है । पर अन्य मनुष्यनि में हूँ जिनके पुण्य के उदयतें सम्यक उपदेश के महणते जिनेन्द्र के प्राराधन में भवित उत्पन्न होय ते समस्त जातिः कुल के धारक यथायोग्य पूजन कर हैं।
__समस्त ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र अपना-अपना सामर्थ्य अपना-अपना ज्ञान कुल बुद्धि सम्पदा संगति देशकाल के योग्य अनेक स्त्री पुरुष नपुसक धनाढ्य निर्धन सरोग नीरोग जिनेन्द्र का पाराधन करें हैं । केई ग्रामनिवासी हैं। केई नगर निवासी हैं केई बन निवासी हैं। केई अति छोटे ग्राम में बसने वाले हैं। जिनमें केई तो अति उज्जवल अष्ट प्रकार सामग्री यनाय पूजन के पाठ पढिकरि पूजन करें हैं, केई कोरा सूका जब गेहूँ, मका, बाजरा, उडद, भूग, मोठ इत्यादिक धान्य की मूठी ल्याय