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[ गो. प्र. चिन्तामरिण
पुष्पों से पूजा करने वाला मनुष्य कमल के समान सुन्दर मुख वाला तरुणी जनों के नयनों से और पुष्पों की उत्तम मालाओं के समूह से देवाला कामदेव होता है।
जायइ णिविज्जवाणेण सतिगो कंति-लेय संपण्यो ।
लावरण जलहि वेला तरंग संपाविय सरीरो ॥१८१४ ॥
नैवेद्य के चढाने से मनुष्य शक्तिमान, कांति और तेज से सम्पन्न और सौन्दर्य रूपी समुद्र की वेला (तट) वर्ती तरंगों से संप्लावित शरीर वाला अर्थात् प्रतिसुन्दर होता है ।
atar atवियासेजी दव्वा तस्य सम्भावो ।
सवभावजय केवलपईवसेएण होइ परो ।।१८१५॥
दीपों से पूजा करने वाला मनुष्य सद्भावों के योग से उत्पन्न हुये केवलज्ञान रूपी प्रदीप के तेज से समस्त जीवद्रव्यादि तत्वों के रहस्य को प्रकाशित करने वाला wer hamarat होता है ।
धूवेण सिसिटयरघवनकित्तिघवलियजयत्तश्रो पुरिसो ।
जायद
फलैहि संपत्त परमशिवारा सोक्खफलो ।।१८१६॥
धूप से पूजा करने वाला मनुष्य चन्द्रमा के समान धवल कीर्ति से जगत्त्रय को धवल करने वाला अर्थात् त्रैलोक्यव्यापी यश वाला होता है। फलों से पूजा करने वाला मनुष्य परम निर्वाण का सुखरूप फल पाने वाला होता है ।
घंटाहि घंट सद्दाउलेसु पवरच्छुराणमम्भम्मि ।
intss सुरसंघायसेवियो वर विमाणेषु ॥१८१७॥
जिनमन्दिर में घंटा समर्पण करने वाला पुरुष घंटाओं के शब्दों से आकुल अर्थात् व्याप्त श्रेष्ठ विमानों में सुर-समूह से सेवित होकर प्रवर अप्सराओं के मध्य में क्रीडा करता है |
छत्तेहि एयछस भुंजर पुहवी सवसपरिहोलो 1 सामरदा तहा विज्जिज्जइ चमरविहेदि ॥१८१८ ॥
छत्र प्रदान करने से मनुष्य शत्रुरहित होकर पृथ्वी को एक छत्र भोगता है । तथा कमरों के दान से चमरों के समूहों द्वारा परिवीजित किया जाता है अर्थात् उसके ऊपर चमर दोरे जाते हैं ।