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अध्यायः दसवां ]
[ ८७५ है और देवी-देवताओं की पूजा षोडशोपचारी है । पूजा-पूजा में भी अन्तर है । विवेक से कार्य करे तो कोई दोष नहीं ।
अष्टविध द्रव्यार्चना करने से क्या फल मिलता है अलग-अलग
द्रव्य से पूजा करने का क्या फल है। और जिन मंदिर बनाना, . , मूर्ति स्थापन करना और पूजा करना, ऐसा करने वालों को क्या
फल मिलता है ? कुत्थु भरिदलभेत्ते जिणभवरणे जो ठवेइ जिणपडिमं । सरिसबमेतं पि लहेइ सो खरो तित्ययर पुण्यं ॥१८०६॥
जो पुरण जिगिदमवरणं समुण्यं परिहि-तोरणसमगं । रिम संEसं को सक्कर बीएसयलं ॥१८१०॥
जो मनुष्य कुथुरी (धनिया) के दलमात्र अर्थात पत्र बराबर जिनभवन बनवाकर उसमें सरसों के बराबर भी जिनप्रतिमा को स्थापन करता है । वह तीर्थकर पद पाने के योग्य पुण्य कोई प्राप्त करता है । तब जो कोई प्रति उन्नन और परिधि, तोरण आदि से संयुक्त जिनेन्द्र भवन बनवाता है । उसका समस्त फल वर्णन करने के लिये कौन समर्थ हो सकता है ?
जलधारारिखक्खेबेस पावमल सोहरणे हवे णियमं । चंदणलेवेस खरो जावर सोहग्गसंपण्यो ॥१८११॥
पूजन के समय नियम से जिन भगवान के आगे जलधारा को छोड़ने से पाप रूपी मैल का संशोधन होता है। चंदनरस के लेप से मनुष्य सौभाग्य से सम्पन्न होता है ।
जायइ अक्खयरिणहि-रयसामित्रो अक्सएहि अक्खोहो। अक्खीगलद्धिजुत्तो अक्खयसोक्खं छ पावे ॥१८१२॥
अक्षतों से पूजा करने वाला मनुष्य अक्षय नौ निधि और १४ रत्नों का स्वामी चक्रवर्ती होता है । सदा अक्षोभ अर्थात रोग शोक रहित निर्भय रहता है अक्षीण लब्धि से सम्पन्न होता है और अन्त में अक्षय मोक्ष सुख को पाता है।
कुसुमेहि कुसेसथवयणु तरुणीजरणयण कुसमवरमाला। . ववएपच्चियदेहो जयइ कुसुमाउहो । धेव ॥१८१३।।