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[ गो. प्र. चिन्तामणि यहाँ कोई पूछे कि गृहस्थ इन मंत्रों का ध्यान करें कि नहीं ? "उसका समावान यह है कि जैसा ध्यान मुनि के होता है, जैसा गृहस्थ के होता ही नहीं, परन्तु जो अपनी शक्ति के अनुसार धर्मार्थी होकर ध्यान करे तो शुभ फल की प्राप्ति होती है; लौकिक प्रयोजन विषय कपाय साधने के लिये आकर्षण विद्वेषण उच्चाटन मारण यादि के लिये ध्यान करने का मोक्ष मार्ग में निषेध किया है।
चित्र नं० ३० का ध्यान ।
मैं उस चौकी पर बैठा विचारता हूं कि मेरे नाभि स्थान पर सोलह पत्तों का श्वेत रंग का कमल खिला हुआ है । उस कमल में हीं, माया बीज स्थापन है । वह कमल बहुत विस्तार में फैला है, तथा जो शुद्ध और साफ है। मैं अपनी ज्ञान दृष्टि उस पर जमाता हूं ऐसा विचार करें ।
चित्र नं० ३१ देखे ।
ध्यानी विचार करे की मेरे हृदय में ग्राठ पांखुड़ी के कमल की रचना है, प्रत्येक पांखुडी पर वारा वारा विन्दु लगे हुवे हैं और बारह बिन्दु मध्य की कणिका पर लगे हुए हैं । इस प्रकार बिन्दु सहित कमल का विचार करके फिर प्रत्येक पाखुडी की प्रत्येक बिन्दु पर एमोकार मंत्र का जप करे । इस प्रकार चिन्तवन करने. से मन की एकाग्रता होती है ।
रूपस्थ ध्यान का वर्णन
रूपस्थ ध्यान का स्वरूप ----
परमेश्वरम् ।
स्वयम्भुवम् ।।५७५ ।। लक्षितम् ।
शेखरम् ॥१५७६ ।।
श्रार्हस्य महिमोपेतं सर्वज्ञ ध्यायेद्दवेन्द्र चन्द्रार्क सभान्तस्थं सर्वातिशय संपूर्ण सर्वलक्षण सर्वभूत हिलं देवं शील शैलेन्द्र सप्त धातु विनिर्मुक्तं मोक्ष लक्ष्मी कटाक्षितम् । अनन्त महिमा धारं सयोगि परमेश्वर ।। ५७७ ।। प्रचिन्त्य चरितं चारु चारित्रैः समुपासितम् । fafar नय निर्णीतं विश्वं विश्वेक बान्धवम् ॥१५७८ ॥ frea करण ग्रामं निषिद्ध विषय द्विषम् । ध्वस्त रागादि सन्तानं भवज्वलन वार्मुचम् ॥१५७६ ॥
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