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________________ [ २७६ यहाँ कोई करे सर्वथा वीतराग तो सर्व मोह का प्रभाव होने से होता है; उसके ध्यान करने की इच्छा ही नहीं होती श्रीर जो इच्छा होती हैं, तो वह वीतराग कैसे हो ? उसका समाधान यह है कि यहां पर राग संसार देह भोग संबन्धी है, उसकी पेक्षा वीतराग कहा है, ध्यान से राग करने को रांग नहीं कहा जाता क्योंकि ध्यान राग का अभाव करने वाला हैं, इस रोग से भी मुनि के रांग नहीं है, इस कारण वीतराग ही कहा जाता है। परमार्थ अपेक्षा यह एकदेश सर्वदेश का व्यवहार जानना । अध्याय : पांचवां निर्मथ्य चन्द्रोदये । तसिन्धु मुन्नतधियः श्रीवीर तस्वान्येव समुद्धरन्ति मुनया यत्नेन तान्येतानि हृदि स्फुरन्ति सुभगन्यासानि भव्यात्मनां । रत्नान्यतः ॥ ये वाञ्छन्त्यनिशं विमुक्तिललानासम्भोग संभावनाम् ॥१५७३॥ श्री वीर वर्तमान स्वामी रूप चन्द्र के उदय होते हुए जो उन्नत बुद्धि मुनि हैं, वे शास्त्र रूपी समुद्र को मथकर सुन्दर है रखना जिनकी ऐसे मंत्र रूप तत्वों ( रत्नों) को निकालते हैं और ये सब मंत्र पदरूप रत्न मुक्ति रूपी स्त्री के संभोग की निरंतर वांला करने वाले भव्य पुरुषों के ही हृदय में स्फुरायमान होते हैं । भावार्थ :-- जो मुक्ति चाहने वाले हैं, वे इन मंत्र रूप पदों का अभ्यास करें । विलानाशेष कर्माणं स्फुरन्तमति निर्मलम् । स्वं ततः पुरुषाकारं स्वाङ्गगर्भगतं स्मरेत् ।। ५७४ ॥ ॥ इन मंत्र पदों के अभ्यास के पश्चात् विलय हुए हैं । समस्त कर्म जिसमें ऐसे निर्मल स्फुरायमान अपने यात्मा को अपने शरीर में चिन्तवन ( ध्यान ) करें । भावार्थ :--- इन मंत्र पदों के अभ्यास से विशुद्धता बढ़ती है और चित्त एकाग्र हो जाने पर शुद्ध स्वरूप का निर्मल प्रतिभास होता है और उस स्वरूप में उपयोग स्थिरता को प्राप्त होता है तथा संवर होता है और कमों की निर्जरा होती है, तथा वाति कर्मों का नाश करके केवल ज्ञान को प्राप्त हो मोक्ष को पाता है । इस प्रकार यह मंत्र पत्रों का ध्यान मोक्ष का महान् उपाय है और लौकिक प्रयोजन भी इससे अनेक प्रकार के सिद्ध होते हैं। अणिमा महिमादिक ऋद्धियां प्राप्त होती हैं, परन्तु मोक्ष के इच्छुक मुनियों को इनसे कोई प्रयोजन नहीं है । 2 1
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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