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[ गो. प्र. चिन्तामणि करना चाहिये।
एवं समस्तवर्णषु मत्र विद्या पदेषु च । काय क्रमेण विश्लेषो लक्ष्य भाव प्रसिद्धये ॥५६८।।
इस प्रकार समस्त अक्षरों में तथा मन्त्र पद और विद्या पदों में अनुक्रम में लक्ष्य भाव की प्रसिद्धता के लिए भेद करना अर्थात् भिन्न भिन्न चिन्तवन करना चाहिये।
अण्यद्याच्छु त स्कन्ध बीजं निर्वेदकारणं ।। तत्तद्धग्रायन्नसौ ध्यानी नापवर्ग पथि स्खलेत् ॥५६॥
अन्य जो जो द्वादशांग शास्त्र के बीजाक्षर हैं तथा बैराग्य के कारण हैं, उन उन मंत्रों का ध्यान करता हुआ मुनि मोक्ष मार्ग में गमन करता हृया डिगता नहीं। भावार्थ-ओ ज्ञान वैराग्य के कारण मन्त्र; पद वा बीजाक्षर हैं, वे सब ही मोक्ष मार्ग में ध्यान करने योग्य (ध्येय) हैं ।
ध्येयं स्याद्वीत रागस्य विश्ववर्त्यथ संचयम् । तद्धर्मव्यत्यया भावान्माध्यस्थ्यमधितिष्ठतः ।।५७०।।
जो वीतराय है, उसके इस लोक में प्रवर्त्तन वाले समस्त पदार्थों के समूह ध्येय हूँ, क्योंकि वीतराग उस पदार्थ के स्वरूप में विपरीतता के प्रभाव से मध्यस्थता का आश्रय करता है । भावार्थ---वीतराग के ज्ञान में जो ज्ञेय आता है, उसका स्वरूप . यथार्थ जानने के कारण उसके इष्ट अनिष्ट ममत्व भाव नहीं होते; इस कारण उनसे मध्यस्थ भाव रहता है, अर्थात् वीतरागता से नहीं डिगते ।।
वीतरागो भवयोगी यत्किञ्चिदपि चिन्तयेत् । तदेव ध्यान माम्नातमतोऽन्यद् ग्रन्थ विस्तरः ॥५७१।।
वीतराग योगी जो कुछ चिन्तवन करे, वही ध्यान है, इस कारण अन्य कहना बह ग्रन्थ का विस्तार मात्र है, वीतराग के सब ही ध्येय हैं ।
वीतरागस्य विज्ञेया ध्यान सिद्धिध्वं मुनेः । . क्लेव एव तदर्थ स्याद्रागार्तस्येह देहिनः ।।५७२॥
जो मुनि वीतराग है, उसके ध्यान की सिद्धि अवश्य होती है और जो राग से पीड़ित है उसका ध्यान करना क्लेश के लिये ही है अर्थात रागी के ध्यान की सिद्धि नहीं होती।
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