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अध्याय : पांचवां ।
[ २७४ मुनिभिः संजयन्ताद्य विद्या वादात्समुद्धतम् । भुक्ति मुक्तः परं धाम सिद्ध चकाभिधम् स्मरेत् ।।५६२।। तस्य प्रयोजक शास्त्रम तदाश्रित्योरदेशतः । ध्येयम् मुनीश्चरं जन्म महाव्यसन शान्तये ॥५६३॥
तत्पश्चात् सिद्धचक्र नामा मंत्र को संजयन्तादिक महामुनियों ने विद्यानुवाद नामा दशम पूर्व से उदृत किया है, सो यह मन्त्र भोग और मोक्ष का उत्कृष्ट वाम है, इसका ध्यान करे। इस सिद्धचक्र मन्त्र के प्रयोजक शास्त्र का आश्रय लेकर उसके उपदेश से जन्मरूप महाकष्ट की शान्ति के लिए मुनीश्वरों को ध्यान करना चाहिये ; इसके अक्षरादिक का विधान उसके प्रयोजक शास्त्र से जानना । असि पाउसा, विद्या का ध्यान--
स्मर मन्त्र पदाधीशम् मुक्ति मार्ग प्रदीपकम् । ... नाभि पङ्खाज संलोन भवर्ण विश्वतोमुखं ॥५६४॥ . सिवर्ण मस्तकाम्भोजे साकारं मुखपङ्कजे । श्राकारं कण्ठकजस्थं स्मरोकारं हृदि स्थितम् ॥५६॥
हे मुने! तू मन्न पदों का स्वामी और मुक्ति के मार्ग को प्रकाश करने वाले अकार अक्षर को नाभिकमल में चिन्तवन कर, यह अक्षर सर्वव्यापी है; और 'सि' अक्षर को मस्तक कमल पर, 'या' अक्षर को कंठस्थ कमल में, 'उ' अक्षर को हृदय कमल पर, और 'सा' अक्षर को मुखस्थ कमल पर ऐसे 'न सि आ उ सा' इन पाँच अक्षरों को पांच स्थानों पर चिन्तवन कर ।।
(चित्र नं. २८ देखे) सर्व कल्याण बीजानि बीजान्यन्यान्यपि स्मरेत् । यान्याराध्य शिवं प्राप्ता योगिनः शीलसागराः ।।५६६।।
सर्व कल्याण के वीज अन्यान्य भी मंत्र हैं, जिनका पाराधन करके शील के सागर योगी गरण मोक्ष को प्राप्त हुये हैं, उन सब ही अक्षरों को ध्यानी मुनि चिन्तवन करे । “नमः सर्व सिद्ध भ्यः' यह भी एक मन्त्र पद है। .. (चित्र नं. २१ देखें)
श्रत सिन्धु समुद्भूत मन्यद्वा पदमक्षरम् । तत्स मुनिभिध्ययं स्यात्पदस्थ प्रसिद्धये ॥५६७॥
अन्य भी पद या अक्षर जो श्रुत समुद्र द्वादशांग शास्त्र से उत्पन्न हुए हैं, बे सब ही पदस्थ ध्यान की प्रसिद्धतार्थ होते हैं उन्हें भी मुनिगुणों को ध्यान गोचर