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________________ ६४२ ] - गो. प्र. विसाभार करते हैं, वे महाहिंसक, महापाप रूप धातक शास्त्रों के समान समझे जाते हैं । इसलिए उनको वेध वा वेधक कहना चाहिए । यहां पर कदाचित् कोई वेद को मानने वाला यह कहे कि "यज्ञ में पशुओं को होमना हमारे वेद में लिखा है । सो मंत्रों की आहूतियों से होमना. बतलाया है । इसी प्रकार देवता को बलिदान देने के लिए होम के अन्त में वध करना भी होम के लिए है । अथवा उस देवता के लिए है, इसलिए ऐसी हिसा में हिंसा का पाप नहीं लगता है। ऐसे यज्ञों को जो करता है अथवा कराता है अथवा जो बकरा, भैंसा, घोड़ा, मनुष्य आदि जीव होमे जाते हैं, वे सब स्वर्ग में जाते हैं, इसलिए ही यज्ञ में जीव होमने का निषेध नहीं है, किन्तु कर्तव्य है ऐसा वेद कहता है, इस प्रकार वेद मानने वाले का कहना नहा हिंसा के दोष को उत्पन्न करता है, क्योंकि यदि वेद यह कहता है कि मंत्रपूर्वक जीवों का होम करने से पाप नहीं लमता" तो वेद का यह कहना मुसलमानों के कहने के समान हुअा। क्योंकि मुसलमान भी यह कहते हैं कि हमारे कुराग की लिगका जीव के ऊपर पडनी चाहिए और उसको शस्त्र से मारकर उसका मांस भक्षरण करना चाहिए । इस प्रकार जीव मारने और उसका मांस भक्षण करने में कोई दोष या पाप नहीं है । लिबका पढ़ लेने के बाद जो जीव मारा जाता है वह सीधा विहिश्त (स्वर्ग) में जाता है । इस प्रकार वेद का कहना और मुसलमानों का कहना समान ही हुआ। वेद मानने वाले गाय को अच्छी मानते हैं और मुसलमान सुअर को अच्छी मानते हैं, बस इतना ही दोनों में अन्तर दिखाई पड़ता है। हिंसा करना दोनों का बराबर है । दोनों ही समान हिंसक है। यहां पर कदाचित् कोई यह कहे कि पहले लोग ऐसे समर्थ होते थे, वे जीवों को होम भी देते थे और फिर उनको मन्त्र पढ़कर जीवित भी कर देते थे । सो उनका कहना भी मिथ्या है। क्योंकि यदि वे इतने समर्थ थे तो फिर उन्होंने अपने कुटुम्ब को मरने से क्यों नहीं बचाया ? अपने सब कुटुम्ब को अमर क्यों नहीं बना दिया? परन्तु आज तक किसी ने अपने कुटुम्ब को अमर नहीं बनाया, इससे सिद्ध होता हैं कि उनका इस प्रकार कहना सब मिथ्या है। जो जीव यज्ञ में होमे जाते हैं, वे सब सीधे स्वर्ग चले जाते हैं, यदि यह बात सच है तो फिर उन लोगों ने अपने कुटुम्ब को हो यज्ञ में क्यों नहीं दिया, जिससे उनका सन्न कुटुम्ब स्वर्ग चला जाता परन्तु अपने कुटुम्ब -- -
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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