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अध्याय : दसवां 1
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तिलान्नं चैव पानीयं शर्कराज्यं पयस्तथा ।
मधु दना समायुक्तः अष्टांगः पिंड उच्यते ॥२०१४ ||
इस प्रकार जो अष्टांग पिण्ड बतलाया है, वह सब व्यर्थ हो जायगा । श्रागे तुम्हारे बहां लिखा है --
farara चोत्तरे भागे मांस भक्षो न दोषभाक् ।
अर्थात् विध्याचल के उत्तर भाग में मांस भक्षण करने वाला दोषी नहीं गिना जाता । इस प्रकार कहकर बहुत से शक्ति के उपासक कान्यकुब्ज, समोडिया, सर्वरिया पुरविया आदि ब्राह्मण मछली बकरा आदि का माँस भक्षण करते हैं । परन्तु उनका यह कहना और करना सब मिथ्या है। क्योंकि मांस कुछ पृथिवी जल से तो उत्पन्न होता ही नहीं है थवा फलों के समान वृक्षों पर लगता नहीं है । वह जंगम जीवों के घात करने से होता है । इस प्रकार जंगम जीवों के बात करने से उत्पन्न हुए मांस को भक्षण करने वाले लोगों के भला जीव दया किस प्रकार पल सकती है, क्योंकि श्राद्धादिक में मांस का काम पडता ही है । इसलिए कहना चाहिए कि इस प्रकार कहने वाले वा मानने वाले बड़े ही अधर्मी हैं ।
आगे जो लोग यह कहते हैं कि क्षत्रियों के कुल में यह परम्परा से मांस भक्षण वा शिकार खेलना चला आया है तथा उनमें से कितने ही इन्द्रियों के लंपटी, विषय कषायों को पुष्ट करने वाले, महाकामी, अधोगति के जाने वाले, भ्रष्ट, महापापी हैं, लोग शास्त्रों में भी मांस भक्षण की पुष्टि करते हैं, धर्म मानकर हिंसा की या मांस भक्षण की पुष्टि करते हैं, परन्तु ऐसे लोग महा-दुर्बुद्धि और महा-मिथ्यादृष्टि हैं । ऐसी बुद्धि वालों के उत्तम बुद्धि कभी नहीं हो सकती ।
ऐसे लोग ऊपर लिखे शास्त्रों को कहकर अपने मिथ्याधर्म की पुष्टि करते हैं परन्तु पहली बात तो यह है कि श्राद्ध कर्म कुछ मोक्ष देने वाला नहीं है । यह तो स्वार्थी लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए चलाया है । इसलिए वह कभी प्रमाण रूप नहीं हो सकता । कदाचित् यह कहा जाय कि हमारे वेद में लिखा है सो भी ठीक नहीं है । क्योंकि जो जीव हिंसा का उपदेश दे, वह वेद कभी नहीं कहा जा सकता । उसे तो वेधक-जीवों का घात करने वाला कहना चाहिए । भला जो "यज्ञार्थ पशवः सृष्टा:" अर्थात् पशुओं को यज्ञ में होम के लिए ही उत्पन्न किया है, इस महा हिंसा की पुष्टि
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