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________________ ६४० ] [ गो. प्र. चिन्तामरिण इन निंद्य कार्यों का उपदेश देते हैं, वे धर्म के नाश करने वाले पाप को बढ़ाने वाले, इंद्रियों के लंपटी अधर्मी और महापतित हैं । ऐसा समझना चाहिये। प्रश्न:- यदि मांस में ऐसा दोष है तो श्राद्ध में मांस खिलाने का विधान क्यों लिखा है। स्मृति शास्त्र में लिखा है "मछली का मांस खिलाने से पितर लोग दो महीने तक तुप्त रहते हैं। हिरण के मांस से तीन महीने तक रहते हैं । भेड के मांस से चार महीने तक तृप्स रहते हैं, पक्षियों के मांस से पांच महीने तक, बकरे के मांस से छह महीने सक, कबूतर के मांस से सात महीने तक, एण जाति के हिरण के मांस से पाठ महीने तक, रोख नाम के हिरण से नौ महीने तक, सूअर तथा भैंस के मांस से दश महीने तक, खरगोश और कच्छप के मांस से ग्यारह महीने तक और गाय के दूध की खीर खिलाने से बारह महीने तक पितर लोग तृप्त रहते हैं। सोही लिखा है-- द्वौ मासौ मत्स्यमांसन मिासा हारमोन का औरभ्रेण तु चत्वारः शाकुनेन तु पंच वै ॥२०११॥ षट्मासाः छाममांसेन पार्वतेन तु सप्त वै । अष्टावरणस्य मांसेन रौरवेण नथैव तत् ।।२०१२।। दशमासास्तु तृप्यन्ति वराहमहिषामिषैः । शशकूर्मस्य मांसेम मासा एकादशैव च ॥२०१३॥ संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन दै। इस प्रकार श्राद्ध में मांस का विधान लिखा है, सो क्यों लिखा है ? उत्तर :-जो लोग इस प्रकार मांस का विधान करते हैं, वे चाहे श्राद्ध करने वाले जैन गृहस्थ हों, चाहे श्राद्ध करने वाले प्राचार्य हों अथवा तृप्त होने वाले पितर हों; वे सब राक्षस बा भोल समझने चाहिए। क्योंकि मांस का विधान करना राक्षसों का काम है। दूसरी बात यह है कि यदि मांस के विधान का ही दृढ़ विश्वास किया जायगा, तो श्राद्ध अधिकार में जो तिल, चावल, जल, शर्करा, घी, दूध, मधु, दही आदि का पिण्ड करना कैसे बतलाया ? देखो श्राद्ध कल्प में कहा भी है-- ASTRAPASES... MARATISEMERIES -PANDEasy ERes ANIN P
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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