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________________ m e . aninamaiainiorwajana A अध्याय : दसवां ] [ ६३६ अज्ञानी पुरुष तो किसी को मानता ही नहीं है, इसलिए उसको कहना ही व्यर्थ है । सोही भारत में लिखा है-- अमेध्यमध्ये . कोटस्य सुरेन्द्रस्य सुरालये। समाना जीविताकांक्षा समं मृत्युभयं द्वयोः ।।२००६।। यथा ममप्रियाः प्रारणास्तथा चान्यस्य देहिनः। इति मत्वा न कर्तव्यो घोर प्रारिणवधो बुधैः ।।२००७।। इसी प्रकार मार्कंडेय पुराण में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि हे अर्जुन ! इस पृथिवी में भी मैं हूँ । समस्त अग्नि, वायु, वनस्पति आदि में भी मैं हूँ और तीनों लोकों में समस्त प्राणियों में भी मैं हूँ। मैं सर्वमत वा सब जगह, सब पदार्थों में, सब जीवों में रहने वाला हूँ। इसलिये सब जीवों में मुझे समझकर जो जीव की हिंसा नहीं करते, उनकी मैं रक्षा करता हूँ। जो जीवों की हिंसा करते हैं, उनका क्षय होता है । यह मार्कंडेय पुराण में लिखा है । यथा पृथिव्यामव्यहं पार्थ सग्निौ च जलेप्यहम् । वनस्पति गतोप्यहं सर्वभूतगतोप्यहम् ॥२००८।। यो मां सर्वएतं ज्ञात्वा न हिसंति कदाचन । सस्याहं न प्रणस्यामि स मे न प्रणस्यति ॥२००६।। शिव धर्म में लिखा है कि मांस में, मद्य में, शहद में और मक्खन में उसी वर्ण के (माम, मक्खन वा शहद के रंग के) असंख्यात असंख्यात जीव हर समय उत्पन्न होते रहते हैं । यथा . मय मांसे मधुनि च नवनीते बहिर्न ते । उत्पद्यन्ते असंख्यातास्तद्वरस्तित्र जन्तवः ॥२०१०॥ इस प्रकार मास में महा दोष हैं। पहले तो यह जीवों की हिंसा से उत्पन्न होता है । तथा फिर उसमें अनेक दोष हैं, यही समझकर धर्मात्मा पुरुष हिंसा का और मांस भक्षण का सर्वथा त्याग कर देते हैं। जो जीव स्वयं मांस नहीं खाते, परंतु दूसरों को उपदेश देते हैं; यह राजाओं का धर्म है । शिकार खेलना राजाओं का धर्म है। उसके लिये मुहूर्त देते हैं सो हिंसा करना वा उसके लिये उपदेश देना या कारण सामग्री मिलाना सब एक हैं। जो लोग S जाति
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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