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। गो. प्र. चिन्तामणि करना, पुष्कर की यात्रा करना और चान्द्रायण तप करना आदि सब व्यर्थ हो जाता । है । जब तक वह मध-मांसादिक का त्याग नहीं करता, तब तक उसको जप-तप, बतउपवास आदि का कोई फल नहीं मिलता। मद्य-मांसादिक का त्याग करने से ही इनका फल मिल सकता है । सो हो भारत में लिखा है--
वृथा एकादशो प्रोक्ता वृथा जागरणं हरेः । तथा च पुष्करी यात्रा वृथा चन्द्रायणं तपः ॥२००३॥
मनुस्मृति में लिखा है--जो कोई जीवों की हिंसा करता है, उसके न तो ध्यान हो सकता है, न स्नान से शुद्धि हो सकती है, न वह दान दे सकता है; लथा न वह मुन क्रिया कर सकता है : हि करने वाले के इन सब बातों का अभाव हो जाता है । यदि वह इन क्रियाओं को कर भी डाले तो भी जीवघात करने से उसका सब किया हुआ निष्फल हो जाता है । सो ही मनुस्मृति में लिखा है--
न च ध्यान न च स्नानं न यानं न च सस्क्रियाः ।
सर्वे ते निष्फलं यान्ति जीव हिंसा करोति यः ॥२००४॥ ' भारत में लिखा है-जो प्राणी बकरा, हिरण, सांभर, गीदड़, सुअर आदि पशुओं का घात करता है, वह उस पाप के फल से उस पशु के शरीर में जितने रोम हैं, उतने ही हजार वर्ष तक अग्नि में पकाया जाता है, यथा---
यावन्ति पशुरोमाणि पशुगात्रेषु भो नरः ।
सावर्ष सहस्त्राणि पश्यन्ते पशुघातकाः ॥२००५॥ ... भारत में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि विष्ठा के कीड़े को और स्वर्ग में रहने वाले इन्द्र को दोनों को जीवित रहने की आकांक्षा एक सो है । दोनों के जीवित रहने को इच्छा में कोई कमी नहीं है । इन्द्र महासुखी है, सो उसे तो जीवित रहने की इच्छा सदा लगी ही रहती है। परन्तु विष्ठा का कीड़ा भी मरना नहीं चाहता, दुःखी होने पर भी वहीं रहना चाहता है। इससे सिद्ध होता है कि उसको भी जीवित रहने की इच्छा लगी हुई है। इसी प्रकार मरने का भय दोनों को एक सा है। दोनों ही मरने से उरते हैं, मरने में सभी को समान दुःख होता है। इसलिए जिस प्रकार अपने प्राण मुझे प्यारे लगते हैं, उसी प्रकार अन्य प्राणियों को भी अपने अपने प्राण प्रिय लगते हैं । यही समझकर बुद्धिमान पुरुषों को घोर और भयंकर ऐसा प्राणियों का वध कभी नहीं करना चाहिए। उपदेश बुद्धिमानों को ही दिया जाता है । मूर्ख और
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