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अध्याय : दसवां ]
[ ६३७ हैं। चक्रवर्ती के बसीस ठुलते हैं, नारायण के सोलह, महामंडलेश्वर के पाठ, अधिराज के चार और महाराज के दो चमर ढुलते हैं । सो ही लिखा है--
तीर्थकराणामिति चामराणि चत्वारि षष्ठ्यात्यधिकानि नित्यं । अद्विमानानि भवन्ति तानि चक्रेश्वराद्याबदसौ सुराजा ।।२०००। प्रश्न :-स्वयंभूरमरण द्वोप और समुद्र के पशु पक्षियों को प्रायु उत्कृष्ट है,
परन्तु यहां के पशु पक्षियों को कितनी है ? : उत्तर--नेबला, चूहे. धूस, बाघ, चीते, कबूतर, कुत्ते और सुअर आदि पशूनों की आयु भगवान परहंत देव ने बारह वर्ष की बतलाई है तथा इसी प्रकार अन्य पशुओं की भी यथा योग्य हीन या अधिक समझ लेनी चाहिये । सोही त्रिलोकप्रज्ञप्ति में लिखा है--
नकुलानां मूषकानां घूषकानां तथैव च । व्याघ्रचित्र कपोसानां मंडलाना जिजीवितम् । शुकराणां तथैवात्र संवत्सरारमा द्विषट् मतम् ॥२००१॥ प्रश्न :-भारत में लिखा है--मध का पीना, मांस का खाना, रात्रि
भोजन करना, कंदमूल खाना आदि क्या अन्य धर्मावलम्बियों के
शास्त्रों में भी निषिद्ध है ? उत्तर ----भारत में लिखा है—मद्य का पिना, मांस भक्षण करना, रात्रि में अन्न पान लेह्य स्वाद्य आदि चारों प्रकार के आहार का भक्षरण करना, कंदमूल खाना महा पाप है । जो कोई पुरुष इसका सेवन करता है; उसको तीर्थ यात्रा जप आदि सब व्यर्थ होता है, उनके यहाँ ६८ तीर्थ माने हैं, सो जो पुरुष मांस, मद्य, रात्रि भोजन, कंदमूल आदि का सेवन करते हैं, उनकी ६८ तीर्थों की यात्रा व्यर्थ होती है । राम, कृष्ण, परमेश्वर आदि का जए सब व्यर्थ होता है । गायत्री मंत्र का जप भी सब व्यर्थ होता है । तथा चान्द्रायण व्रत तथा और भी बत, तथा पंचाग्नि आदि अनेक प्रकार के कष्ट देने वाले तप सब व्यर्थ हो जाते हैं । सो ही भारत में लिखा है
मद्यमांसाशनं रात्रौ भोजनं कन्धभक्षणम् ।। ये फुर्वन्ति वृथा तेषां तीर्थयात्रा जपस्तपः ।।२००२॥
उसी में आगे लिखा है कि मद्य-मांस भक्षण करने वाले वा रात्रि भोजन करने वालों के एकादशी व्रत का उपवास करना, नारायण के मन्दिर में जागरण
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