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[गो. प्र. चिन्तामणि सोलहवें स्वर्ग तक उत्पन्न हो सकते हैं, आगे कल्पातीत देवों में उत्पन्न नहीं होते, सो ही मूलाचार में लिखा है
संखादी दाऊरणं मरणयतिरिक्खारण मिच्छभावेरस । उववादो जोदिसिए सक्करतं तसाई तु१६.६७
तथा अन्य मती परिवाजक लोग अपने शुभ भावों से. मरकर भवनवासियों से लेकर बारहवें सहस्त्रार स्वर्ग तक उत्पन्न हो सकते हैं। आगे नहीं जा सकते । सो ही लिखा है---
परियाजगए रिणयमा उक्करसं होदि वंभलोगाम्हि । उपकस्य सहस्सार ति होदि या आजीवगाण तहा ॥१६६७॥ भाषा में लिखा है। . . प्रश्न :--सुना जाता है कि एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक के जीच सब
तीनों लोकों में सब जगह भरे हुए हैं, सो क्या यह बाल ठीक है? उत्तर-~-यह बात ठीक नहीं है, इसमें इतना विशेष है कि पृथ्वीकायिक अपकायिक, तेजस्कायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक तथा नित्यनिगोद इतरनिगोद के समस्त एकेंद्रिय जीव ऊध्र्वलोक, मध्यलोक, अधोलोक समस्त तीनों लोकों में भरे हुए हैं, तथा पंचेन्द्रिय जीव नारकी मनुष्य तिर्यञ्च आदि. संत्री जीव तीनों लोकों में रहने वाली असनाडी में भरे हुए हैं और दो इन्द्रिय, ते इन्द्रिय, चौइन्द्रिय असंज्ञी पशु और मनुष्य गति के पंचेन्द्रिय जीव मध्यलोक में ही उत्पन्न होते हैं । ये जीव दुसरी जगह उत्पन्न नहीं होते । नरक स्वर्ग तथा सिद्धस्थान में ये जीव उत्पन्न नहीं होते, मध्यलोक में ही उत्पन्न होते हैं । सो ही मूलाचार में लिखा है
एइंखियाय पंचे दियाय उसमह सिरयलोएसु । सयल विलिदिया पुरण जीवातिरियं हि लोयं हि ॥१६९८॥ स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा में भी लिखा है-- वितिचक्खा जीवा हवंति नियमेरस कम्मभूमीसु । चरिमे दीबे अद्ध चरिमसम्मुद्देसु सध्येसु ॥१६६६॥ प्रश्न :-तीर्थकर प्रादिक पदवीधर पुरुषों पर जो चमर ढलाये जाते हैं, . उनका प्रमाण क्या है ? .. : उत्तर----श्री तीर्थकर केवली भगवान के तो सदा चौसठ चमर ढुलते रहते
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