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________________ अध्याय : दसवां. ] [ ६३५ परतिरियगदो हितो भवतियादो च रिणगया ओंवा । रए लहंते ते पदवि ते वाटिसलाग पुरिसाणं ।।१६६३।। स्वर्गलोक में भी कल्पवासी तथा कल्पातीत देवों में भी कितने ही जीव आकर इन पदवियों को पाते है और बहुत से जीव नहीं पाते । उनका क्रम इस प्रकार हैं । अनुदिश वा अनुत्तर विमानवासी कल्पातीत देव वहां से आकर बलभद्र तीर्थ कर चक्रवर्ती पद पाते हैं, किन्तु वहां से देवों में से आकर बासुदेव नहीं होते। यह नियम है । सो ही मूलाचार में लिखा है-- णिन्धुदिगमणे रामत्तणे य तिस्थयर चक्कट्टित्त । अणुविसंणुत्तरवासी तदो चुदा होंति भयपिज्जा ।।१९६४॥ ऐसा शलाका पुरुषों के होने का नियम है । : ... प्रश्न :----कौन किस किस गति से प्राकर मनुष्य हो सकता है तथा किस किस गति से आकर नही हो सकता ? उत्तर---अग्निकाय और वायुकाय इन दोनों के सूक्ष्म तथा स्थूल जीव पाकर मनुष्य भव धारण नहीं करते, ऐसा नियम है बाकी, के समस्त गतियों के जीव आकर मनुष्य हो सकते हैं । सो हो भूलाचार में लिखा है-- सटोपि तेडकाया सव्वे तह बाउकाइया जीवा। ण लहंति माणुसतं रिपयमाद् अखंतर भवेहि ॥१६६५॥ दण्डक भाषा में भी लिखा हैतेजकाय अरु वायुकाय । इन दिन और सबै नर थाय । प्रश्न :-अन्यमत के तापसी परिवामक प्राधि तप करते हैं, वे मरकर ऊपर स्वर्ग में कहां तक जा सकते हैं? उत्तर--नसंख्यात वर्ष की प्रायु वाले जीव अर्थात् कुभोग भूमि के मनुष्य वा तिर्यञ्च मरने के बाद अपने मिथ्यात्व रूप भावों से भवनवासी 'व्यंतर ज्योतिष्क इन तीनों ही जाति के देवों में उत्पन्न होते हैं। वे भागे वैमानिक देवों में उत्पन्न नहीं हो सकते । इसी प्रकार जो उत्कृष्ट भावों को धारण करने वाले हिंसा पूर्वक पंचाग्नि प्रादि तप धारण करने वाले और कंदमूल भक्षण करने वाले तपस्वी मरने के बाद अपने अज्ञान तप के फल से भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिष्क और कल्पवासी देवों तक
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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