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________________ Ramnam Ratopam ६३४ ] [ मो. प्र. चिन्तामणि ___णिरएहि णिग्गदाणं प्रारमंतर भवेहि रिणयमा छ । बलदेव वासुदेव तणं च तह चक्कवट्टीणं ॥१६८६|| यह सिम है कि योनि से निकर बार, बलभद्र वासुदेव और चक्रवर्ती की पदवी प्राप्त नहीं होती। सो हो सिद्धांतसार दीपिका में लिखा है-- निर्मस्य नरकान्जीया चक्रश बल केशवाः । । तच्छत्रवो न जायन्ते चयन्त्यंते यतो दिवात् ।।१९६०॥ त्रिलोकसार में भी लिखा है-- हिपरयचरो मस्थि हरिबल चक्को। इस प्रकार लिखा है। प्रश्न :-यहां पर कदाचित कोई यह पूछे कि वेसठ शलाका पुरुष कहां से पाकर उत्पन्न हो सकते हैं और कहाँ-कहाँ से आकर उत्पन्न नहीं होते, इस का खुलासा किस प्रकार है ? उत्तर :--मनुष्य तथा तिर्यञ्चगति से आकर तीर्थंकर, चक्रवर्ती, नारायण, प्रतिनारायण और बलभद्र नहीं होते। स्वर्ग व नरक . इन दो गतियों से ही आकर उत्पन्न होते हैं, सो ही मूलाचार में लिखा---- मारण स तिरियाय वहा सलाम पुरिसाण होति खलु पियमा । - तेसि अरणंतर भवे भरिणरजं. णिन्थुलुदीगमणं ॥१९६१॥ प्रश्न :-जो शलाका पुरुष देवगति से आकर होते हैं, वे किन किन देवों को जातियों से आकर होते हैं, और किन किन निकायों से नहीं उत्तर :---भवनवासी व्यंतर ज्योतिषी इन तीनों निकायों के देव तो आकर शलाका पुरुष होते नहीं तथा सोलह स्वर्ग, नी बेयक, नौ अनुदिश और पंच पंचोत्तर के देव पाकर तीर्थ कर श्रादि. शलाका पुरुष हो सकते हैं, ऐसा नियम है । सो ही मूलाचार में लिखा है-- प्राजोदिसिचि देवा सलाग सुरिसा प.होति ते णियमा । तेसि अणंतर भवे भयारिण णिबुदी गमरसं ॥१९६२॥ त्रिलोकसार में लिखा है. . . . . .
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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