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________________ अध्याय : दसवां ] [ ६३३ नौ प्रकार के भवनवासी समस्त देवांगनाओं के मानसिक प्रहार का समय इसी क्रम से समझना चाहिये । सो ही लिखा है प्रसुतित्तिसु सासाहारा पक्खं समासहस्संतु । सुमुहत दिरणार तेरस वारस बलूरंग ॥१६८५ ।। भावार्थ -- असुर कुमारनि के एक पक्ष भये एक बार उच्छ्वास होता है, हजार वर्ष गये एक बार हार होता है। बहूरि नागकुमार आदि तीन जाति विष साढा बारा मुहूर्त भये उच्छ्वास हो है, साढ़ा बारा दिन गये श्राहार हो है । बहुरि दिक्कुमार आदि तीन जाति विर्षे साढ़ा सात मुहूर्त भये उच्छवास होवै सादा सात दिन गये प्रहार हो हैं । भवावासादीणं गोजर पाया गरगच्चणादिधरा ! भोमा हास्सासा साहिय परणबिरण महलाय ।।१६८६ ।। बहुरि व्यंतरनि के प्रहार किंछू अधिक एक हजार वर्ष पीछे होता है, कुछ अधिक पांच मुहूर्त भये जानना । ज्योतिष्कों का आहार कुछ अधिक एक हजार वर्ष पीछे होता है । कुछ अधिक का परिमाण अंतर्मुहूर्त अधिक लेना चाहिये । जैसा मूलाचार में लिखा हैउक्कस्सेरणाहारो वाससहस्साहिए भवणाणं । जोदिसियारां पुण भिष्णमुहुत्त फेदि सेक्कस १६८७॥ . इसी प्रकार ज्योतिषियों का भिन्न मुहूर्त अधिक एक पक्ष के उच्छ्वास होता है, जैसे- उक्कणुच्छासो पक्खेणाविएण होइ भवरणासं । महत्तपत्त तहा जो सियांगारण भोमारा ।।१६८८ ।। प्रश्न :--- -दंडक में लिखा है कि तीसरे नरक से निकलकर कोई जीव तीर्थंकर भी होते हैं, सो यह वर्शन किस प्रकार है ? उत्तर :-- बलदेव, वासुदेव और चक्रवर्ती ये जीव नरक से निकलकर कभी नहीं होते । स्वर्गलोक से भाने वाले जीवों को ही यह पद प्राप्त होता है । इसका भी कारण यह है कि यह पदवी बिना संयम के प्राप्त नहीं होती तथा संयम सहित मरण करने वाला जीव नरक में जाता नहीं । इसलिए इस पदवियों को पाने वाला स्वर्ग से ही आता है । सो ही मूलाचार में लिखा है-
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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