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[ गो. प्र. चिन्तामणि प्रश्न :-ऊपर लिखे अनुसार गहस्थ का यथायोग्य पाचरण तो मालूम
हुआ, परन्तु यदि रजस्वला स्त्री रोगिरणी हो अशक्त हो, उसको
स्नानादि किस प्रकार कराना चाहिए ? उत्तर:----यदि कोई स्त्री रोग वा शोक से अशक्त हो वा बुढापे से अशक्त हो और रजस्वला हो जाय तो उसकी शुद्धि इस प्रकार करनी चाहिये कि चौथे दिन कोई निरोग सशक्त स्त्री उसे स्पर्श करे फिर स्नान करे, फिर स्पर्श करे फिर स्नान करे। इस प्रकार वह दश बार उसको स्पर्श करे तो यह स्त्री शुद्ध हो जाती है । अंत में रजस्वला के वस्त्रों को बदलवाकर दश वा बारह बार आचमन कर तथा स्नान कर लेने से वह नीरोग स्त्री भी शुद्ध हो जाती है रोगिणी रजस्वला स्त्री की शुद्धि का यह क्रम है । सो ही त्रिवणकर में लिया है.
आतुरे तु समुत्पन्न दशवारमनातुरा। स्नास्वा स्नात्वास्पर्शदेनामातुरा शुद्धिमाप्नुायत् ॥१९८१॥ जराभिभूता या नारी रजसा चेत्परिप्लुता । कथं तस्य भवच्छौच्यं शुद्धिः स्थास्केन कर्मणा ।।१९८२॥ चतुर्थेहनि संप्राप्ते स्पर्शदन्या तु तां स्त्रियम् । सा च सचैव ग्रामा यः स्पर्शस्नात्वा पुनः पुनः ।।१६८३॥ दश द्वादश वा कृत्वा ह्याचमनं पुनः पुनः । अंत्ये च वाससा त्यागं स्नात्वा शुद्धा भवेतु सा ॥१९८४॥ प्रश्न :-जिन बेघों की आयु जितने सामरों की है, उनका मानसिक आहार
उतने ही हजार वर्ष बाद होता है । तथा उनका श्वासोच्छ्वास उतने ही पक्ष बांद होता है । यह कथन प्रसिद्ध है परन्तु जिन देवों की प्रायु पल्यों की है, उनके आहार और श्वासोच्छ्वास का क्या
नियम है ? उत्तर :- भवनवासियों में उत्कृष्ट प्रायु असुरकुमार देवों की है। सो उनके मानसिक आहार एक हजार वर्ष से अधिक समय बाद होता है तथा सूर्य, चन्द्रमा प्रादि ज्योतिषी देवों के सागरोपम के अंशों के हिसाब से अलग-अलग है । और बाकी के जो
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