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अध्याय : दसवां ]
[ ६३१ के दोषों का और उनके शुद्ध करने का वर्णन विशेषकर प्रायश्चित शास्त्रों से जान लेना चाहिये। यहां संक्षेप में लिखा है ।
कितने ही लोग अपनी लक्ष्मी के मद में प्राकर रजस्वला स्त्रियों को भूमि पर नहीं सोने देते, किंतु उन्हें पलंग पर सुलाते हैं । यदि कोई इसका निषेध करता है तो अपनी राजनीति का अभिमान करते हुये नहीं मानते हैं, किंतु उसी तरह चलते हैं परन्तु ऐसे लोग बड़े अधर्मी गिने जाते हैं। जो मुनि होकर घोड़े पर चड़े, जो स्त्री रजस्वला अवस्था में ही पलंग पर बैठे या सोवे तथा जो गृहस्थ शास्त्र सभा में बैठकर बाते करे ऐसे पुरुषों को देखकर ही दस्त्र लाहित ना करना चाहि ।
____भावार्थ :--जब ऐसे लोगों को देखकर ही देखने वालों को वस्त्र सहित स्नान करना पड़ता है तो फिर उन लोगों के पाप की तो बात ही क्या है अर्थात् वे बहुत भारी दोष के भागी होती हैं, सो ही लिखा है--
अश्वारूढं यतिं दृष्ट्या खट्वारूढां रजस्वलाम्। .. शास्त्र स्थाने गहवतन् सचेल स्नान माचरेत् ॥१९७८।। प्रश्न :--यदि रजस्वला स्त्री के पास बालक हो तो उसके स्पर्शास्पर्श को
• शुद्धि किस प्रकार है? उत्तर :---यदि कोई बालक मोह से रजस्वला स्त्री के पास सोवे बैठे वा रहे तो सोलह बार स्नान करने से उसकी शुद्धि होती है, यदि कोई दुध पीने वाला बालक दूध पीने के लिये उसका स्पर्श करे तो जल के छोटे देने मात्र से ही उसकी शुद्धि हो जाति है । ऐसे छोटे बालक को स्नान करने का अधिकार नहीं है। सो ही त्रिवर्णाचार में लिखा है--
सया सह तद्वालस्तु अधष्ट स्नामेन शुद्धयति । तो स्पर्शन् स्तनपायी वा प्रोक्षणे नेवशुद्धयति ।।१६७६॥
कदाचित् कोई यहां पर लौंटा देने का संदेह करे तो इसका उत्तर यह है कि प्रायश्चित शास्त्रों में और भी कितने ही पदार्थ बतलाये हैं, जिनमें स्पर्श का दोष नहीं माना जाता । जैसे मक्खी, हवा, गाय, सुवर्ण, अग्ति महानदी, नाव, पाथोदक और सिंहासन अस्पर्य नहीं होते ऐसा विद्वानों का कहना है--
मक्षिका मारतो गावः स्वर्णमग्नि महानदी। नादः पायोधक पीठं नास्पृश्यं बोच्यते युश्चैः ॥१६८०॥ .