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[ गो. प्र. चिन्तामणि प्रलापी भूरि कथनादुन्मत्तस्तु परिश्रमात् । खलोति भूमि खननादुन्मत्तो वात सेवनात् ॥१६५५।।
इस प्रकार अयोग्य कर्मों के करने के दोष बतलाये हैं, सो इनका त्याग करना । ही उचित है। .... ..
जो कोई अनाचारी इनका दोष नहीं मानते । कितने ही लोग स्पर्श कर लेने पर भी स्नान नहीं करते । कितने ही लोग दूसरे तीसरे दिन स्नान कराकर उसके हाथ से किये हुए संब तरह के भोजन खा लेते हैं । कोई-कोई लोग उन्हीं दिनों में कुशील सेवन भी करते हैं, परन्तु ऐसे लोग महाप्रधी कहलाते हैं। ऐसे लोग स्पर्श करने योग्य. भी नहीं है। इसका कारण यह है कि रजोधर्म वाली स्त्री की पहले दिन चांडाली संज्ञा हैं, दूसरे दिन ब्रह्माधातिनी संज्ञा है, तीसरे दिन रज की संज्ञा है । और चौथे दिन शुद्ध होती है । यथा
प्रथमेऽहनि चांडाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी । तृतीये रज को प्रोक्त चतुर्थेऽहनि शुद्धयति ॥१९७६।।
इसलिये स्त्री चौधे ही दिन शुद्ध होती है । जो स्त्री पुरुष गामिनी है, वह जीवन पर्यन्त अशुद्ध रहती है । व्यभिचारिणी स्त्री स्नानादिक कर लेने पर भी शुद्ध नहीं होती। वह परपुरुष का त्यागकर देने मात्र से ही शुद्ध हो सकती है । सो ही लिखा है--
त्रिपक्षं जायते सूता ऋतुधात्री दिनत्रयम् । परजनरता नारी यावज्जीवं न शुद्धयति ।।१६७७॥
कितने ही अधर्मी इन तीन दिनों में भी सामायिक प्रतिक्रमण तथा शास्त्र के स्पर्श आदि कार्यों को करते हैं, ऐसे लोग उससे होने वाले अविनय और महापाप को नहीं मानते । यदि कोई इन कामों के करने के लिये निषेध करता है, तो उत्तर देते हैं, कि इस शरीर में शुद्ध पदार्थ है ही क्या ? इसमें से नव द्वार सदा बहते रहते हैं, यदि किसी के गोठ वा फोड़ा हो जाता है और वह पककर फूट जाता है उसी प्रकार स्त्रियों का यह मासिक धर्म है। इस प्रकार कहकर वे लोग मानते नहीं, परन्तु ऐसे लोग प्राज्ञाबाह्य ते महापातकी अनाचारी हैं।
रजस्वला स्त्रियों के स्पर्श-अस्पर्श का, उसकी भूमि की शुद्धि का तथा संभाषण आदि
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