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अध्याय : दसवां ]
[ ६२६ में नाखून काटती है, तो उसके बालक के नाखूनों में विकार हो जाता है । उस बालक के नाखून फटे टूटे सूखे, काले, हरे, टेड़े और देखने में बुरे हो जाते हैं। यदि वह स्त्री इन तीन दिनों में उबटन करती है वा तेल लगाती है, उसके बालक के अठारह प्रकार के कोढ रोगों में से कोई सा भी कोढ़ रोग हो जाता हैं। यदि वह इन तीन दिनों में गंध लगावे वा जल में डूबकर स्नान करे तो वह बालक दुराचारी व्यसनी होता है। यदि वह आंखों में अंजन लगा तो उसके बालक को नेत्र नाद सहित हो जाते हैं । दिन में सोने से वह बालक रात दिन सोने वाला होता है । अथवा सदा ऊघने बाला बालक . होता है । जो स्त्री इन तीन दिनों में दौड़ती है, उसका बालक चंचल होता है, उत्पाती उपद्रवी होता है ! ऊचे स्वर से बोलने से या सुनने से उसका बालक बहिरा होता है । जो स्त्री इन दिनों में हंसती है, उसके बालक के तालु, जीभ, होठ काले पड़ जाते हैं । इन तीन दिनों में अधिक बोलने से उस स्त्री के प्रलापी बालक होता है । जो झूठा हो चालाक हो उसको प्रलापी कहते हैं ! 'प्रलापोनृतभाषणम्' भूठ बोलना का नाम प्रलाप है । जो स्त्री रजोधर्म के समय में परिश्रम करती है, उसके उन्मत्त उन्माद रोगवाला वा बाबला पुत्र होता है । जो स्त्री उन दिनों में पृथ्वी खोदती है, उसके दुष्ट बालक होता है । जो चौड़े में सोती है, उसके उन्मत्त बालक होता है। इस प्रकार अयोग्यता से अनेक दोष उत्पन्न होते हैं । इसलिये ये अयोग्य कार्य नहीं करना चाहिये । विवेक पूर्वक रहना चाहिये । यह कथन जैन शास्त्रों का नहीं, किंतु लटकन मिश्र के पुत्र भाव मिश्र के बनाये हुए भाव प्रकाश नाम के वैद्यक शास्त्र में लिखा है, यहां प्रकरण समझकर लिख दिया है । यथा--
प्रज्ञानाद्वा प्रमादादा लोल्याता दैवतश्च वा । साचेत्कुर्यानिषिद्धानि गर्ने दोषास्तदाप्नुयात् ॥१६७१॥ एसस्या रोदनाद् गर्भो भवेद्विकृत लोचनः । नखच्छेदेत कुनखी कुष्ठी स्वभ्यंगसो भवेत् ॥१९७२२॥ अनुलेपासथा स्नानाद दुःशोलो जननादरक । स्थापिशीलोविवास्वापापाच्चंचल स्यात्प्रधावनात्॥१९७३॥ प्रत्युच्च शब्द अषणाधिरः खलु जापते । तालुदंतीष्ठ जिह्वासु श्यामो हसनतो भवेत् ॥१६७४।।
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