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________________ ६२८ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि वृक्षमूले स्वपेन्नैव खट्वा शय्यासनं तथा । मंत्र पंचनमस्कारं जिन स्मृति स्मरेद् हदि ॥१६६७॥ अंजतावश्नीयात्पर्ण पात्र लाने व पैत्तले। .. भुक्त्वा चेत्कांश्योपात्र शुद्धयति तस्तुवन्हिना॥१९६८॥ चतुर्थे निवसे स्नायात् प्रातः गोसर्गतः परम् ।। पूर्वाह्न घटिका षट्कं गोसर्ग इति भाषितः ।।१६६६॥ शुद्धा भतुश्चतुल्लि भोजने रंधनेऽपि वा। , देव पूजा गुरू पास्ति होम सेवासु पंचमे ॥१९७०।। रजस्वला स्त्रियों के प्राचरण इस प्रकार बतलाये हैं। जो स्त्रियां रजोधर्म के तीन दिन में अंजन लगाती हैं, उवटन करती हैं, पुष्पमाला पहनती हैं, गंध लगाती - हैं, तेल मर्दन करती हैं, और ऊंचे स्वर से बोलती हैं. उनका गर्भ सदोष और विकृत रूप हो जाता है। स्त्रियों को ऋतुस्त्राव के तीन दिन तक ब्रह्मचर्य पूर्वक डाभ के आसन पर सोना चाहिये । आंसू बहाना, नाखून काटना, उबटन लगाना, तेल लगाना, गंव लगाना, आंखों में अंजन लगाना, पानी में डूबकर स्नान करना, दिन में सोना, दौडना, बहुत ऊंचे स्वर से किसी को आवाज देकर बुलाना, ऐसे ही ऊंचे शब्द सुनना, हंसना, अधिक बकवाद करना, कूदना, पीसना, अधिक बोझ उठाना, पृथ्वी खोदना, फैल फूटकर (बहुत सी जगह घेरकर) बैठना वा सोना तथा ऐसे ही अयोग्य कार्य तीन दिन नहीं करना चाहिये। अपने पति को भी न देखना चाहिये । हाथ में रखकर अथवा मिट्टी के सकोरा में व पत्तलों में रखकर रूखा अन्न भोजन करना चाहिये। यदि कोई स्त्री अपनी अजानकारी से वा उसमें लोलुपता के कारण अथवा दैवयोग से ऊपर लिखे कार्यों को करती है, तो उसके अनेक प्रकार के दोष उत्पन्न हो जाते हैं। यदि कोई स्त्री इन ऋतु के तीन दिन में रोती है, तो उसके गर्भ के बालक के (जो बालक आगे गर्भ में आवेगा) उसके नेत्र विकृत हो जाते हैं। अंधा हो जाता है, धुंधला हो जाता है । अांख में फूला हो जाता है वा. कारणा ऐंचाताना हो जाता है। अथवा वह ढेर हो जाता है। उसकी आंखों से पानी बहता रहता है, उसकी अखि लाल हो जाती हैं वा बिल्ली की . सी अांखें हो जाती है । इस प्रकार उस बालक के नेत्रों में अनेक प्रकार के विकार उत्पन्न हो जाते हैं । यदि कोई स्त्री इन तीन दिनों
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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