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अध्याय : दसवां ]
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तथा ऊन का बिछोना आदि का स्पर्श न करना चाहिये । तीन दिन तक उसको धर्म को बात करनी चाहिये। जिस प्रकार मालती माध्वी वा कुन्द श्रादि की बेल संकुचित रूप से रहती है, उसी प्रकार संकुचित होकर प्राण धारण कर रहना चाहिये । तीन दिन तक शीलव्रत पालना चाहिये, दूध, दही, घी, छाछ आदि गरे रस का त्याग करना चाहिये। एक बार रूखा न खाना चाहिये । उसको नेत्रों में काजल, चंजन आदि कुछ नहीं डालना चाहियें। उबटन करना, तेल लगाना, पुष्प माला पहनना, गंध लगाना यदि गार के सब साधनों का त्याग कर देना चाहिये। तीन दिन तक उसको अपने देव, गुरू, राजा और अपने कुल देवता का रूप दर्पण में भी नहीं देखना चाहिये तथा न इनसे किसी प्रकार का संभाषण करना चाहिये । इन स्त्रियों को तीन दिन तक किसी वृक्ष के नीचे अथवा पलंग पर नहीं सोना चाहिये तथा दिन में भी नहीं सोना चाहिये । उसे अपने मन में पंच णमोकार मंत्र का स्मरण करना चाहिये। उसका उच्चारण नहीं करना चाहिये । केवल मन में चितवन करना चाहिये । अपने हाथ में वा पतल ● में भोजन करना चाहिये। किसी भी धातु के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिये । यदि वह किसी तांबे, पीतल आदि के पात्र में भोजन करें तो उस पात्र को अग्नि से
शुद्ध करना चाहिये। चौथे दिन गोसर्ग काल के बाद से लेकर छह घड़ी पर्यंत गोसर्ग काल कहा जाता है। स्त्री अपने पति के और भोजन बनाने के सेवा तथा होम कार्य में वह पांचवे दिन हैं—
स्नान करना चाहिये । प्रातःकाल चौथे दिन स्नान के बाद वह लिये शुद्ध समझी जाती है । देव पूजा, गुरु शुद्ध होती हैं । सो ही त्रिवर्णाचार में लिखा
काले ऋतुमती नारी कुशासने स्वपेप्सती । एकांत स्थान के स्वस्था अनदर्शनजता ।। १६६३॥ nagar वा देव धर्म वार्ता विजिता । मालती माध्वो वल्लीकु ददिति काकरा ।।१६६४॥ create दिन श्रीरिण चैक भक्तं विगोरसम् । अंजनाभ्यंगस्नान गंध मंडन वजिता ।। १६६५। "देवं गुरुं नृपं स्वस्य रूपं च वर्पणेs पिवा । न पश्येत्कुलदेवं च नैव भाषेत तैः समम् ।।१९६६ ।।