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[ गो. प्र. चिन्तामरिंग वह स्नान करने मात्र से शुद्ध हो जाती है। यदि उसके अठारहवें दिन रजोधर्म हो तो . उसको दो दिन का सूतक पालन करना चाहिये यदि उसके उन्नीसवें दिन रजोधर्म हो तो उसको तीन दिन तक सूतक पालन करना चाहिये । तब वह शुद्ध होती है । यदि रजस्वला होने के बाद चौथे दिन स्नान कर ले और फिर रजस्वला हो जाय तो फिर वह अठारह दिन तक शुद्ध नहीं होती अर्थात् उसे अठारह दिन तक सूतक पालन करना चाहिये । सो ही त्रिवर्णाचार के तेरहवें परिच्छेद में लिखा है
रजः पुष्पं ऋतुश्चेति नामाग्यस्यैव लोकप्तः । द्विविधं तत्तु नारीणां प्रकृतं विकृतं भवेत् ।।१९५४॥ .. .. ... .... तत्प्रकृतं यत्तु स्त्रीणां मासे मासे स्वभावतः । अकाले द्रव्य रोगाद्य-द्र कात्तु विकृतं मतम् ।।१६५५॥ प्रकाले घेदि स्त्रीणां -सद्रजो नैव दुष्यति । पंचाशद्वर्षादूध्वं तु. अकाल इति भाषितः ॥१६५६॥ . . रओ या दर्शनास्त्रीणां अशौचं दिवसत्रयम् । कालजे चाद्धरात्राचेत् पूर्व सस्कस्थचिभ्मसम् ॥१६५७॥ राः कुर्यात्रिमागं तु द्वौ भागौ पूर्ववासरे । ऋतौ सूते मृते चैव ज्ञेयोऽन्त्यः स परेहनि ॥१६५८।। ऋतुकाले व्यतीते तु यदि नारी रजस्वला । तत्र स्नानेन शुद्धिः स्यादष्टादशविनात्पुरा ॥१९५६॥ दिनाच्चेषोडशाद|क् नारी या चाति यौवना। पुनः रजस्थलापि स्याछुद्धिः स्नान के वन ॥१९६०॥ रजस्वलायाः पुनरेव चेद्रज़ः प्रारदृश्यतेऽष्टादश वासराच्छुत्रः । अष्टावशाहि यदि छेद दिनद्वयादेकोनविंशे त्रिदिनातत. परम् ॥१६६१॥ रजस्वला यदि स्मात्वा पुनरेव रजस्वला । अष्टादशदिनादक शुचित्वं न निगद्यते ॥१९६२॥ प्रागे रजस्वला स्त्री के प्राचरण आदि के योग्य अयोग्य की विधि लिखते हैं। . . .
यदि कोई स्त्री अपने समय पर रजस्वला हुई तो उसको तीन दिन तक ब्रह्मचर्य पूर्वक रात्रि में किसी एकांत-स्थान में जहां मनुष्यों का संचार न हो ऐसी जगह डाभ के आसन पर सोना चाहिये ! उसको खाट, पलंग, शय्या, वस्त्र, रूई का.बिछोना