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________________ [ ६२५ प्रश्न : --- गृहस्थों के घर स्त्रियां रजस्वला होती हैं, उनके योग्य प्रयोग्य ware की fafe fकस प्रकार है ? अध्याय : दसवां ] उत्तर :- इसका विधान भाषा के क्रिया कोश आदि शास्त्रों में लिखा है । तथापि यहाँ पर कुछ विस्तार और विशेषता के साथ लिखते हैं-जो स्त्रियां रजस्वला होती हैं, सो प्रकृतिरूप से तथा विकृति रूप से ऐसे दो प्रकार से होती हैं । जो स्वभाव से ही प्रत्येक महीने योनि मार्ग से रुधिर का स्राव होता है, वह प्रकृतिरूप होता है । जो समय में ही अर्थात् महीने के भीतर ही रजःस्राव होता है, उसको विकृतिरूप कहते हैं, वह दूषित नहीं है, उसके होने पर केवल स्नानमात्र से शुद्धि होती है । उसका सूतक नहीं होता । यदि पचास वर्ष के बाद पचास वर्ष की अवस्था से ऊपर रज:स्राव हो तो उसकी शुद्धि स्नानमात्र से ही है । अभिप्राय यह है कि जो रजःलाब महीने से पहले होता है, वह विकार रूप है और रोग से होता है । स्त्रियों के प्रदर आदि अनेक रोग होते हैं, उन्हीं से होता है । इसी प्रकार रजोधर्म का समय पचास वर्ष तक है । उसके बाद जो रजोधर्म हो तो वह रजःस्वलां के समान सदोष नहीं है, उसकी शुद्धि स्नान मात्र से ही होती है । जो बारह वर्ष की अवस्था से लेकर पचास वर्ष तक प्रति मास रजोधर्म होता है, वह काल रजोधर्म है । इसके बाद अकाल रूप कहा जाता है, इस प्रकार इसके दो भेद हैं । आगे इसका विशेष वन लिखते हैं। जिस दिन स्त्री के रज का अवलोकन हो, उस दिन से लेकर तीन दिन तक मशौच है । यदि उस दिन आधी रात तक रजोदर्शन हो तो भी पहला दिन समझना चाहिये । श्रागे इसी का खुलासा लिखते हैं । रात्रि के तीन भाग करना चाहिये । इसमें से पहला और दूसरा भाग तो उसी दिन में ना चाहिये और पिछला एक भाग दूसरे दिन की गिनती में लेना चाहिये । ऐसी आम्नाय हैं । यदि ऋतुकाल के बाद फिर वही स्त्री अठारह दिन पहले ही रजस्वला हो जाय तो वह केवल स्नान मात्र से ही शुद्ध हो जाती है। उसको तीन दिन का शौच नहीं लगता है। यदि कोई स्त्री अत्यंत यौवनवती हो और वह रजःस्वला होने के दिन से सोलह दिन पहले फिर रजःस्वला हो जाय तो वह स्नान करने मात्र से शुद्ध हो जाती है । इसका भी स्पष्ट अभिप्राय यह है कि रजस्वला होने के बाद फिर वही स्त्री रजस्वला होने के दिन से यदि अठारह दिन पहले फिर रजस्वला हो जाय तो
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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