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अध्याय : दसवां ]
[ ६४३ को कोई नहीं होता। इससे मालूम होता है कि होम करना ..सब स्वार्थ और जिव्हालंपटता के लिए है।
___ इसके सिवाय एक बात विचार करने की यह है कि यदि मांसभक्षण योग्य होता तो भारत आदि तुम्हारे ही शास्त्रों में मांस को अत्यंत निंद्य और त्याग करने योग्य क्यों बतलाया जाता है ? जैसा कि पहले भारत का प्रमाण देकर लिख चुके हैं। तथा यहां फिर भी प्रसंग पा गया है इसलिये प्रसंगानुसार कुछ और भी भी लिखते हैं । आपके धर्म शास्त्र में लिखा है
मांसाशिनो न पात्राः स्युन मास दानमुत्तमम् । तत्पित्राणां कथं तृप्त्य. भुक्तं मांसाशिभिर्भवेत् ॥२०१५॥ पुत्र गापित दानने पितरः स्वर्गमाप्नुयुः । तहि तत्कृतपापेन तेपि गच्छंलि दुर्गसिम् ॥२०१६॥ कि जाप्य होम नियमस्तीर्थ स्थानेन भारत । यदि मांसानि खादन्ति सर्वमेव निरर्थकम् ॥२०१७॥
जो मांस भक्षी हैं, वे कभी पात्र हो नहीं सकते। कितने ही लोग कहते हैं कि हम ब्राह्मण हैं इसलिये दान के पात्र हो सकते हैं । इसी प्रकार मांस का दान भी दान नहीं कहा जा सकता। ऐसी हालत में उन पितरों की तृप्ति कैसे हो सकती है ? कदाचित् ब्राह्मणों को मांस खिलाने से पितर लोग तृप्त हो जाय तो फिर यह भी मानना पड़ेगा कि वे पितर लोग भी मांस भक्षी हैं । यदि अपने पुत्र के द्वारा दान देने से यदि पितर लोगों को स्वर्ग की प्राप्ति होता है तो फिर पुत्र ने जो मांस दान के लिये जीवों का वध किया वा कराया, मांस पिंड दिया तथा मांस का भक्षण किया उसके पाप से पितरों को दुर्गति की भी प्राप्ति होनी चाहिये । हे भारत ! जो जीव मांस भक्षण करते हैं, वे चाहे जितना राम कृष्ण आदि का नाम उच्चारण कर जप करें चाहे जितना होम करें, चाहे जितने नियम करें, चाहे जितनी तीर्थ यात्रा करें और चाहे जितने तीर्थ स्नान करें परन्तु उनका सब करना व्यर्थ है, मिथ्या है। इस प्रकार धर्म शास्त्र और पुराणों में केवल मांस भक्षरण के ही अनेक दोष बतलाये हैं। भारत के शांति पर्व में लिखा है
न देयानि न ग्राह्यारिस षड्वस्तूति पंडितः । अग्निर्मधु विषं.शस्त्रं मा मांसं तथैव च ॥२०१८॥
REATRESS
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