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[ गो. प्र. चिन्तामणि अर्थ-विचारशील पंडितों को अग्नि, शहद, विष, शस्त्र, मद्य और मांस ये छह वस्तुएँ न तो किसी को देनी चाहिये, न किसी से लेनी चाहिये । जब इस छहों पदार्थों का लेन देन भो निषिद्ध बतलाया है, तब फिर मांस भक्षण करना वा कराना किस प्रकार संभव हो सकता हैं। फिर भी जो मानते हैं, सो सब मिथ्या है। इसके सिवाय भी भारत के शांति पर्व में लिखा है
एकतश्चतुरो थेदा ब्रह्मचर्य च एकतः । एकतः सर्वपापानि मद्यमांसं च एकातः ॥२०१६।। न गंगा न च केदारं न प्रयागं न पुरस्करम् । न च ज्ञानं न च ध्यान न सपो जपभक्तयः ।।२०२०॥ मवान महावरण पूना न्द्र गुरौ नुतिम् तस्यैव निष्फलं यान्ति यस्तु मांसं प्रलादत्ति ।।२०२१॥ तिलसर्षपमानं च यो मांसं . भक्षयेवरः ।
स याति नरकं घोरं यावञ्चन्द्र दिवाकरौ ॥२०२२॥ . . जिस प्रकार एक ओर चारों वेद हैं और एक अोर ब्रह्मचर्य है, उसी प्रकार एक और संसार भर के समस्त पाप हैं और एक ओर मद्य मांस का सेवन है।
भावार्थ----ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अर्थवेद ये चार वेद हैं । सो चोरों ही वेद तो एक ओर हैं और स्त्री मात्र का त्याग करने रूप'ब्रह्मचर्य एक ओर है, इनमें में चारों वेदों से शील व्रत की महिमा अधिक है, जिस प्रकार चारों वेदों से ब्रह्मचर्य की महिमा अधिक है उसी प्रकार संसार भर के समस्त पापों से मद्य मांस सेवन का पाप अधिक है। इससे सिद्ध होता है कि मद्य मांस सेवन करने से सबसे अधिक पाप होता है।
इसी प्रकार जो मांस भक्षण करते हैं, उनके न तो गंगा है, न केदार है, न प्रयाग है, न पुष्कर है, न ज्ञान है, न ध्यान है, न जय है, न तप है, न भक्ति है, न दान है, न होम हैं, न ज्ञान है, न वंदना है । अर्थात् मांस भक्षण करने वाले की सब क्रियायें व्यथें हैं, उसके किये हुये समरत पुण्यकार्य भी व्यर्थ हो जाते हैं-- निष्फल हो जाते हैं । • इस प्रकार महादोष से भरे हुयें मांस को जो तिल वा सरसों मात्र भी खाता है । वह जब तक आकाश में सूर्य चन्द्रमा रहेंगे तब तक घोर नरक में सड़ता रहेंगा, इस प्रकार
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