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अध्याय: दसवां ]
मांस खाने का फल महा निद्य और नीच बतलाया है । भारत में लिखा है- श्री कृष्ण पांडवों से कहते हैंस्नानोपभोग रहितः पूजालंकार वजितः । मधुमास तिवृत्तश्च गुणवान् तिथिभवेत् ।।२०२३॥
अर्थ --- जिसने शहद और मांस का त्याग कर दिया है, वह चाहे स्नान उपभोग रहित हो और चाहे तिलक आदि पूजा से अलंकारों से रहित हो तो भी वह गुणवान् प्रतिथि माना जाता है । बहुत से लोग स्नान, आचमन, संध्या, तर्पण, तिलक कंठी आदि का अभिमान करते हैं परन्तु उन्हें सोचना चाहिये कि सबसे मुख्य शहद और मांस का त्याग है। जिसने शहद और मांस का त्याग नहीं किया है, उसके स्नान आचमन आदि का कोई मूल्य नहीं है। मांस शहद का त्याग किये बिना केवल स्नानादिक करने में कोई गुण नहीं है। शहद और मांस का त्याग करना सबसे श्रेष्ठ हैं । शक्ति के उपासकों को वा अन्य शहद मांस खाने वालों को यह उपदेश बहुत अच्छी तरह समझ लेना चाहिये ।
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कितने ही भेषमात्र को धारण करने वाले वैरागी शहद और मांस का भक्षण करते हैं और शहद मांस की खाते हुये भी अपने में ब्राह्मणपना मानते हैं सो भी मिथ्या है। क्योंकि शहद और मांस का खाना ब्राह्मण का लक्षण नहीं है। किंतु चांडाल का लक्षण है । सो ही महाभारत के शांति पर्व में लिखा है
मद्य मांस मधु त्यागी पंचोदुम्बरद्रमः | निशाहार परित्यक्तः एतद्ब्राह्मण लक्षणम् ॥२०२४ ॥ सत्यं नास्ति तपो नास्ति चेंद्रियनिग्रहः ।
सर्वभूतदया नास्ति एतच्चांडाल लक्षणम् ॥। १०२५ ।।
अर्थ - जिसके मद्य, मांस और शहद के भक्षण करने का त्याग हो, बड़ फल, पिपल फल, गूलर, पाकर, अंजीर इन पांचों उदुम्बर फलों का त्याग हो और जिसके रात्रि में भोजन करने का त्याग हो, वही ब्राह्मण है । ब्राह्मण के ये ही लक्षण है, इन लक्षणों के बिना केवल अपने आप ब्राह्मण बनने वाले कभी ब्राह्मण नहीं हो सकते । जिसमें ऊपर लिखे ब्राह्मण के लक्षण हों और जो सम्यग्दर्शन से सुशोभित हों वही ब्राह्मण मानने योग्य समझा जाता है। जिसके मद्य मांसादिक का त्याग न हो, न सत्य भाषण करता हो, न तपश्चरण करता हो, न इन्द्रियों का निग्रह करता हो और जो