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[ गो. प्र. चिन्तामणि समस्त प्राणियों की दया भी पालन न करता हो वह ब्राह्मरण नहीं किंतु चांडाल कहा जाता है। क्योंकि ये चांडाल के लक्षण हैं। मद्य मांसादि का सेवन करने वाला की ब्राह्मण नहीं हो सकता।
यदि यह बात है तो धर्म की उत्पत्ति किस प्रकार है? ऐसा प्रश्न अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा है । सो ही भारत के शांति पर्व में
लिखा हैकथमुस्पयते धर्मः कथं धर्म विवर्धते । कथं च स्थाप्यते धर्मो कथ धर्मो विनश्यति ॥२०२६॥
अर्थ---अर्जुन पूछते हैं कि हे भगवन ! धर्म किस प्रकार उत्पन्न होता है किन-किन कारणों से बढ़ता है, किस प्रकार ठहरता है और किस प्रकार नाश को प्राप्त होता है, इनका उत्तर जो श्री कृष्ण ने दिया है वह इस प्रकार है। जैसा कि भारत में लिखा है
सत्येनोत्पद्यते धर्मों दयावान वद्धते । क्षमया स्थाप्यते धर्मों कोध लोभाद्विनपूयति ॥२०२७॥
अर्थ- सत्य व्रत से धर्म उत्पन्न होता, दया पालन करने और दान देने से बढता है, समस्त जीवों पर क्षमा भाव धारण करने से धर्म की स्थिरता रहती है तथा क्रोध और लोभ से धर्म का नाश होता है।
इसके आगे फिर श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कह रहे हैं, जैसा कि भारत में लिखा
तस्य व्यर्थाणिकर्माणि सर्वे यज्ञाश्च भारत । सर्वे तीर्थाभिषेकाश्च यः कुर्यात्प्राणिनां वधः ॥ अहिंसा सत्यमस्तेयं त्यागो मैथुनयर्जनम् । एतेषु पंच सूक्तेषु सर्वे धर्माः प्रतिष्ठिताः ॥२०२८।। अहिंसा लक्षणो धर्मः अधर्मः प्राणिनां वधः। . तस्माद्धर्माधिना लोके कसंध्या प्राणिनां दया ॥२०२६॥ ध्र वं प्राणिमधे यशो मास्ति यज्ञ हिंसकः । सर्वसस्व हिससव सवा यज्ञो युधिष्ठिर ॥२०३०॥
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