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________________ Grameenad.... अध्याय : दसवां ] [ ६४७ अर्थ- जो प्राणियों का वध करता है, उसकी सब क्रियाएँ, संब यज्ञ और सब तीर्थों पर किये हुए अभिषेक व्यर्थ हैं । क्योंकि हिंसा असत्य परिग्रह का त्याग और मैथुन करने का त्याग वा ब्रह्मचर्य का पालन करना इन पांचों में ही सब धर्मों का समावेश हो जाता है। इस संसार में अहिंसा वा किसी प्रकार की हिंसा न करना ही धर्म है और प्राणियों का वध करना ही अधर्म है, इसलिये धर्मात्मा लोगों को समस्त प्राणियों पर दया अवश्य पालन करनी चाहिये । जो यज्ञ प्राणियों का वध करने से होता है, वह कभी यज्ञ नहीं कहा जा सकता है क्योंकि प्राणियों का वध करने वाला हिंसक समझा जाता है। और हे युधिष्ठिर ! - यज्ञ वही कहलाता है, जिसमें समस्त प्राणियों पर दया पालन की जाय, किसी भी प्राणी की हिंसा न की जाय । इसी भारत के शांति पर्व में लिखा है- . ... इन्द्रियाणि पशन करवा वेदों कत्वा तपोयीम् । अहिंसामाहुति . . कुर्याच्चात्मयज्ञं यजामहे ॥२०३१॥ अर्थ :--पांचों इन्द्रियां ही होम करने की सामग्नी बनाना चाहिये, तपश्चररण को वेदी बनाना चाहिये और अहिंसा की आहुति देनी चाहिये । इस प्रकार आत्मयज्ञ सदा करते रहना चाहिये । ___इस संसार में देखो बलिदान लेने वाले देवता भी कैसे निर्दयी हैं, जो हाथी, घोड़े, सिंह आदि का बलि तो नहीं लेते, किन्तु केवल बकरे का होम बतलाते हैं । सो ठीक ही है । देव भी दुर्बलों का ही घात करता है, सो ही लिखा है अश्वं नैव गज नेव सिंहो मैध च नैवच । प्रजापुत्रं बलि पद्यात् देवो बुर्बल घातकः ।।२०३२।। जो देवता बलिदान चाहते हैं, वे देवता भी निर्दयी समझना चाहिये और उनका कर्ता भी महापापी समझना चाहिये । लिखा भी है यज्ञं कृत्वा पशून हत्वा कृत्वा रुधिरकर्दमम् । सोष गम्यते स्वर्गेन्नरके केन गम्यते ॥२०३३॥ अर्थात् -- यश करने वाले यज्ञ में अनेक पशुओं को मारकर और रुधिर की कीचड़ भरकर यदि स्वर्ग चले जाते हैं, तो फिर मरक में किन-किन कामों के करने से जायेंगे? EPTemia
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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