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[ गो. प्र. चिन्तामरि
भावार्थ :-- ये सब काम तो नरक में जाने के कारण हैं, यदि इनको स्वर्ग का कारण मान लिया जायगा लो फिर नरक का कारण संसार में कुछ मिलेगा हो नहीं अथवा श्रहिंसा सत्य श्रादि को नरक का कारण मानना पड़ेगा, परन्तु ऐसा हो नहीं सकता, इसलिए यज्ञादिक की कल्पना सब व्यर्थ है। भारत के शांति पर्व में कृष्ण अर्जुन के संवाद के समय लिखा है कि लोभी, मायाचारी, कपटी और इन्द्रियों के विषय भोगों के लोलुपी मनुष्यों ने केवल अपने स्वार्थ लिए जीवों की हिंसा में धर्म माना है, सो उनकी यह वितरीतता है । सो ही लिखा है
लोभ मायाभि भूतानां नराणां हरिणाच *
एषां प्राणिवधे धर्मो विपरीतता भवन्ति ते ॥२०३४ ॥ ॥
भारत में दया और हिंसा का स्वरूप दिखलाते हुए लिखा हैहिंसा सर्वभूतानां सर्वशैः प्रतिभासिता ।
इदं हि मूलं धर्मस्य शेषं तस्यैव विस्तरः ||२०३५॥
उद्यतं Rearrator faaादमयविव्हलाः ।
जीवाः कम्पति संत्रस्ताः नास्ति मृत्युसमं भयम् ।।२०३६||
अर्थः- समस्त जीवों की दया पालना, सबकी रक्षा करना हिंसा है । यही सब धर्मों का मूल है। बाकी सब इसी का विस्तार है ।
. भावार्थ -- जिस प्रकार वृक्ष के टिकने का मुख्य कारण जड़ है। जड़ होने पर उसकी शाखायें प्रतिशाखायें होती हैं और शाखायें प्रादि होने पर उन पर फल
लगते हैं । उसी प्रकार धर्म रूपी वृक्ष की जड़ वा मूल दया है। दया के सहारे ही यह धर्म रूपी वृक्ष टिका है। बाकी सत्य अचौर्य ब्रह्मचर्य आदि सब इसी दया रूप मूल की शाखायें हैं तथा त्याग, व्रत, जप, तप, संयम, उपवास. तोर्थ यात्रा दान आदि भी सब इस दया धर्म की शाखायें हैं । इस प्रकार यह दया धर्म सर्वोत्तम धर्म है । ऐसा सर्वश देव ने कहा है । हिंसा इससे विपरीत है । देखो जिस समय चंड कर्मों को करने वाला, दुष्टबुद्धि को धारण करने वाला हिंसा के भाव रूप रोद्र परिणामों से प्रत्यन्त भयानक, महापतित अधम नीच भ्रष्टाचारी कोई घातक वा शिकारी पुरुष पशु-पक्षियों को देखकर उनके मारने के लिए उन पर शस्त्र उठाता है हुए शस्त्र को देखकर अपने मरने के भय से वह पशु वा प्राप्त होता है, अत्यन्त विह्वल हो जाता है, घबडा जाता है, उसका शरीर कंपने लगता
उस समय उस चमचमाते पक्षी अत्यन्त विषाद को