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अध्याय आठवां ]
[ ७३३.
उसे
इसी महत्त्व के कारण निर्वारण के हेतु दिगम्बर मुद्रा को श्रावश्यक मान, निर्वाण मुद्रा कहा गया है ।
प्रश्न :- - कैलास पर्वत ( अष्टापदगिरि) का स्वरूप क्या है
?
उत्तर : -- सिद्ध क्षेत्रों में सबसे पहले कैलास पर्वत बताया गया है । वहां से भगवान ऋषभदेव मोक्ष गए हैं। उत्तर पुराण में लिखा है कि भरत चक्रवर्ती ने उस पर्वत पर रत्नमय जिनालय बनवाये थे और अजितनाथ तीर्थङ्कर के समय सगर चक्रवर्ती के साठ हजार पुत्रों ने पर्वत के चारों ओर खाई का निर्माण किया था । कहा भी हैराजाऽप्याज्ञापिता यूयं केलासे भरतेशिना । गृहा कृता महारलेश्चतुर्विंशतिरहंताम् ॥१६०२ ॥
सेषां गंगा प्रकुर्वीध्वं परिखां परितो गिरिम् ।
इति तेऽपि तथाsकुर्वन दंडरत्नेन सत्वरम् ।।१६०३ ॥
चक्रवर्ती सगर ने अपने पुत्रों को आज्ञा दी कि महाराज भरत ने कैलाश पर्वत पर महारत्नों से अरहन्त देव के चौबीस जिनालय बनवाए हैं। उस पर्वत के चारों ओर खाई के रूप में गंगा का प्रवाह बहा दो । यह सुनकर उन राजपुत्रों ने ausरत्न लेकर शीघ्र ही उस काम को पूर्ण कर दिया । अत्यन्त दुर्गम होने के कारण तथा मार्ग अज्ञात होने से वहां पहुंचना अशक्य हो गया है ।
प्रश्न :-- गंगा भागीरथ नदी का उद्गम कहां से है ?
उत्तर :--- गुणभद्र प्राचार्य ने यह भी कथन किया है कि राजा भागीरथ ने वैराग्य उत्पन्न होने पर वरदत्त पुत्र को राज्य लक्ष्मी देकर कैलाश पर्वत पर जाकर शिवगुप्त महामुनि के समीप निर्वाण दीक्षा ली और गंगा के किनारे ही प्रतिमायोग धारण किया। गंगा के तट से ही उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया था । इन्द्र ने आकर क्षीर सागर के जल से भगीरथ मुनि के चरणों का अभिषेक किया था, उस अभिषेक का जल गंगा में मिला | तब से ही वह गंगा संसार में तीर्थ रूप में पूज्य मानी जाती है । कहा भी है-
सुरेन्द्र सास्य दुग्धान्धिपयोभिरभिषेचनात् । मयोस्तत्प्रवाहस्य गंगायाः संगमे सति ॥१६०४॥ तदा प्रभृति तीर्थत्वं गंगाप्यस्मिन्नुपसंगता | कृत्योत्कृष्टं तपो गंगातटे निसि गतः ॥१६०५।।