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[ गो. प्र. चिन्तामणि संग-स्यागः कषायाणां निग्रहो व्रतधारणम् । मनोऽक्षारणां जयश्चेति सामग्री ध्यानजन्मनः ॥१६००॥
वस्त्रादि परिग्रह का त्याग, कषायों का निग्रह, व्रतों का धारण करना, मन तथा इन्द्रियों का वश में करमा गे सागरी कर ली हलाक्ति के लिये आवश्यक है।
'बाह्मचेलादिग्रंथत्यागोऽभ्यंतर परिग्रह त्यागमूलः'-बाह्य पदार्थ वस्त्रादि का परित्याग अंतरंग त्याग का मूल है । जैसे -- चावल के ऊपर लगी हुई मलिनता दूर करने के पूर्व में तंदुल का छिलका दूर करना आवश्यक है, तत्पश्चात् बावल की भीतर की मलिनता दूर की जा सकती है, इसी प्रकार बाह्य परिग्रह त्यागपूर्वक अंतरंग में निर्मलता प्राप्त करने की पात्रता प्राप्त होती है । जो बाह्म मलिनता को धारण करते हुए अंतरंग मलिनता को छोड़ ध्यान का आनन्द लेते हुए सिद्धों का ध्यान करना चाहते हैं तथा कर्मों की निर्जरा तथा संवर करने की मनोकामना करते हैं, वे जल का मंथन करके घृत प्राप्ति के उद्योग सदृश कार्य करते हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि वस्त्रादि के भार से जो मुक्त नहीं हो सकते हैं, उनकी मुक्ति की ओर यथार्थ में प्रवृत्ति नहीं होती है । जो देशसंयम धारण करते हुए दिगम्बरमुद्रा की लालसा रखता है, वह श्रावक मोक्षमार्गस्थ है । धीरे-धीरे वह अपनी प्रिय पदवी को प्राप्त कर सकेगा, किन्तु जो वस्त्र त्यामादि को व्यर्थ सोचते हैं, वे सकलंक श्रद्धावश अकलंक पदवी को स्वप्न में भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं । गंभीर विचारवाला अनुभवी सत्पुरुष पूर्वोक्त बात का महत्व शीघ्र समझेगा । दुराग्रही पुरुष के ऊपर परिग्रह के ममत्त्व का पिशाच सदा सवार रहने से वह अचेलअवस्था के सद्गुणों की कल्पना भी नहीं कर सकेगा।
मूलाराधना में कहा है -- भृकुटी चढाना प्रादि चिन्हों से जैसे - अंतरंग में क्रोधादि विकारों का सद्भाव सूचित होता है, इसी प्रकार बाह्य अचेलता से अंतर्मल दूर होते हैं। कहा भी है--
बाहिर करणविशुद्धि अभंतरकरणसोधणस्थाए । गह कुडयस्स सोधी सबका सतुत्थस्स कहुंचे ॥१६०१॥
बाह्य तप द्वारा अंतरंग में विशुद्धता आती है तथा जो धान्य सतुष है, उसका अंतर्मल नष्ट नहीं होता है । तुष शून्य धान्य ही शुद्ध किया जाता है ।
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