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________________ TRAIासागरस - Modakarina । ७४० ] [ गो. प्र. चिन्तामणि प्रश्न :-वैविक लोग भी कैलास पर्वत को पूज्य मानते हैं, क्यों ? उत्तर :-वे हिमालय पर्वत के समीप जाकर कैलाश की यात्रा करते हैं। कैलास का जैसा वर्णन उत्तर पुराण में किया गया है, वैसी सामग्री का सद्भाव अब तक ज्ञात नहीं हो सका है । उसके विषय में यदा कदा कोई लेख भी छपे हैं, किन्तु उनके द्वारा ऐसी सामग्री नहीं मिली है, जिसके आधार पर उस तीर्थ की वंदना का लाभ उठाया जा सके । कैलास नाम के पर्वत का ज्ञान होने के साथ निर्वाण स्थल के सूचक कुछ जैन चिन्हों का सद्भाव ही उस तीर्थ के विषय में संदेह मुक्त कर सकेंगे। अब तक तो उसके विषय में पर्ण प्रजानकारी ही है। प्रश्न :---सिद्ध भगवान का क्या संदेश है ? उत्तर :-वृषभनाथ भगवान के समान सभी तीर्थंकरों का निर्वाण महोत्सव सम्पन्न हग्रा । वे सिद्ध भगवान अपनी ज्ञानमयी परिणति के द्वारा सभी जीवों को यह सचित करते हुये प्रतीत होते हैं 'अरे भव्य जीवों ! तुम विकारी भाव को शीघ्र छोड़ो और हमारे समान स्वराज्य के स्वामी बनो।' . मानों यह संदेश भरतेश्वर के अत्यन्त विरक्त मन में प्रवेश कर गया । एक दिन दर्पण में मुख देखते समय भारत महाराज की दृष्टि एक श्वेत केश पर पड़ी । उसे देख भरत को ऐसा लगा मानो मुक्ति पुरी से भगवान के द्वारा प्रेषित विशिष्ट संदेश-वाहक दूत हो पाया हो । चक्रवर्ती ने छहखंड प्रमाण पौद्गलिक साम्राज्य का स्याम करके शीघ्र ही दिगम्बर मुद्रा धारण की और शत्रुध्वंस कला में पारंगत योगी भरत ने अंतर्मुहूर्त में ही मोहासुर का विनाश करके सर्वज्ञता प्राप्त की। वृषभनाथ भगवान के समान भरत भगवान ने समस्त देशों में विहार कर जीवों का उद्धार किया तथा मोक्ष प्राप्त किया । ___ पंच कल्याणक प्राप्त तीर्थंकरों की तथा अनंत सिद्धों की विशुद्ध आराधना रूप अमृत से परिपूर्ण यह भावना करनी चाहिये । जा गदी अरहन्तारणं रिपट्टि दहारणं च जा गदी। जा गदी बीदमोहारणं सा मे भवदु . सस्सदा ॥१६०॥ जो गति पर हन्तों की है, जो गति कृत कृत्य सिद्धों की है, जो गति वीत मोह जनों को है, वह गति मुझे सदा प्राप्त हो। SNO .... air m -.'..--..'..d.. anArIATRIC WAIIANE ."teamed todaMAY
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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