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... गो. प्र.चिन्तामणि प्रर्यादिषु यथा ध्यानी संक्रामत्यविलम्बितम् ।
पुनावत ते तेन प्रकारेण स हि स्वयम् ॥१०८०॥
जो ध्यानी अर्थ व्यञ्जन प्रादि योगों में जैसे शीघ्रता से संक्रमण करता है वह ध्यानी अपने आप पुनः उसी प्रकार लौटता है।
वियोगी पूर्व विद्यः स्यादिदं ध्यायत्यसौ मुनिः ।
सवितर्क सविचारं सपृथक्त्वमतो मतम् ।।१०८१॥ जिसके तीनों योग होते हैं और पूर्व का जानने वाला होता है, वही मुनि इस पहले ध्यान को धारण करता है। इसलिये इस. ध्यान का नाम सवितर्क सविचार सपृथकत्व कहा है।
अस्याचिन्त्य प्रमावस्य सामर्थ्यात्स प्रशान्त धीः । .. मोहमुन्मूलयस्येव . शमयत्यथवा क्षणे ॥१९५२॥
___ इस अचिन्त्य प्रभाव वाले ध्यान के सामर्थ्य से, जिसका चित्त शान्त हो गया है ऐसा ध्यानी मुनि क्षणभर में मोहनीय कर्म का मूल से नाश करता है; अथवा उपशम करता है।
इदमत्र तु तात्पर्य श्रुतस्कन्धमहारसवात् ।
अर्थमेकं समाशय ध्यानान्तरं व्रजेत् ॥१०५३।।
इस ध्यान में अर्थादिक के पलटने का तात्पर्य यह है कि श्रुत स्कन्ध अर्थात् द्वादशांग शास्त्र रूप महा समुद्र से एक अर्थ को लेकर उसका ध्यान करता हुआ दूसरे अर्थ को प्राप्त होता है। ... शब्दाच्छब्दान्तरं यायद्योगं योगान्तरादपि ।
सविचार मियं तस्मात्सवितकं च लक्ष्यते ।।१०८४॥
यह ध्यान एक शब्द से दूसरे शब्द पर जाता है और एक योग से दूसरे योग पर जाता है इसलिये इसका नाम सविचार सवितर्क कहते हैं।
अतस्कन्धमहासिन्धुं भवगाह्य महामुनिः ।
ध्यायेत्पृथक्स्व वितर्फ वीचारं ध्यानमनिमम् ॥१०॥
महामुनि द्वादशांम शास्त्र रूप महा समुद्र का अवगाहन करके, इस पृथकत्ववितर्क विचार नामक पहले शुक्ल ध्यान को ध्यावे ।
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