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अध्याय : पांचवां }
[ ४४३ एवं शान्तकषायामा कर्मकक्षाशु शुक्षरिणः ।
एकस्वध्यानयोग्यः स्यात्पृथक्वेन जिताशयः ॥१०८६॥ इस प्रकार पृथकत्व ध्यान से जिसने अपमा चित्त जीत लिया है और जिसके कषाय शान्त हो गए हैं और जो कर्म रूप कक्ष अर्थात् तृण समूह अथवा वन को दग्ध करने के लिए अग्नि के समान हैं। ऐसा महामुनि एकत्व ध्यान के योग्य होता है।
' पृथक्त्वे तु या ध्यानी भवत्यसल मानसः ।
तदकत्वस्य योग्यः स्वादाविभूतात्म विक्रमः ॥१०४७॥ . . जिस समय इस ध्यानी का चित्त पृथकत्व ध्यान के द्वारा कषाय मल से रहित होता है, तब इस ध्यानी का पराक्रम प्रकट होता है और तभी यह एकत्व ध्यान के योग्य होता है । भावार्थ-एकत्व ध्यान, पृथकत्व ध्यान पूर्वक ही होता है।
ज्ञेयं प्रक्षीण मोहस्य पूर्वज्ञस्यामिता तेः ।
सवितर्कमिदं ध्यान मेकत्व मति निश्छलम् ।।१०८८॥ ___जिसका मोहनीय कर्म नष्ट हो गया है और जो पूर्व का जानने वाला है और जिसकी दीप्ति अपरिमत है, उस मुनि के अत्यन्त निश्छल ऐसा यह सवितर्क एकत्व ध्यान होता है।
अपृथक्त्वमवीचारं सवितर्क छ योगिनः ।
एकत्वमेक योगस्य जायतेऽत्यन्त निर्मलम् २१०६ किसी एक योग वाले मुनि के पृथकत्व रहित, विचार रहित और वितर्क सहित ऐसा यह एकत्व ध्यान अत्यन्त निर्मल होता है।
द्रध्यं चेकमणु चैकक पर्यायं चैकमश्रमः ।
चिन्तयत्येक योगेल यौकत्यं तदुच्यते ॥१०॥ जिस ध्यान में योगी खेद रहित होकर, एक द्रव्यं को, एक अणु को अथवा एक पर्याय को एक योग से चिन्तवन करता है, उसको एकत्व ध्यान कहते हैं। .
एक द्रव्यमथाणु वा पर्यायं चिन्तयेति । .
योगैकेन यदक्षीणं तदेकत्वमुदीरितम् ॥१०६१
यदि यति समर्थ होता हुआ एक योग से एक द्रव्य, एक अणु अथवा एक पर्याय का चिन्तबन करे उसे एकत्व ध्यान कहते हैं।