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[ गो. प्र. चिन्तामणि अस्मिन् सुनिर्मल ध्यान ताशे प्रविम्भिते ।।
विलीयन्ते क्षरणादेव धातिकर्माणि योगिनः ॥१०६२।।
योगी पुरुषों के अतिशय निर्मल एकत्ववितर्क अविचार नामक द्वितीय ध्यान रूपी अग्नि के प्रकट होते हुए धातिया कर्म क्षणमात्र में नष्ट हो जाते हैं।
इम्बोधरोधक द्वन्द्वं मोहविध्नस्य वा परम् ।
स क्षिरणोति क्षणादेव शुक्लनमध्वजाचिषा ||१०६३।। ध्यानी मुनि इस दूसरे शुक्ल ध्यान रूपी अग्नि की ज्वाला से दर्शन और नाम के आरा करने वाले दर्शनाप, ज्ञानावरण कर्म को, मोहनीय कर्म को और अन्तराय कर्म को क्षणमात्र में ही नष्ट कर देता है।
भावार्थ--इस. एकत्व शुक्ल ध्यान से घाति कर्म शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं।
इस प्रकार पृथक्त्ववितर्क विचार और एकत्व वितर्क अविचार इन आदि के दोनों शुक्ल ध्यानों का निरूपण किया। इनका संक्षिप्त भावार्थ यह है कि पहले ध्यान में द्रव्य पर्यायरूप अर्थ से अर्थान्तर का संक्रमण करता है तथा उस अर्थ की संज्ञा रूप शास्त्र के वचन से बचनान्तर (दूसरे बचन) का संक्रमण करता है और तीनों योगों में से एक योग से दूसरा, दूसरे से तीसरा योगान्तर-इस तरह संक्रमण करता है ; पलटते. पलटते ठहरता भी है, परन्तु उसी ध्यान की सन्तान चली जाती है, इसलिये उस ध्यान से मोहनीय कर्म का क्षय अथवा उपशम होता जाता है और दूसरे ध्यान में संक्रममा होना बन्द हो जाता है। तब शेष रहे हुए घालिया कर्मों का जड़ से नाश करके, केवल ज्ञान को प्राप्त होता है।
प्रात्मलाभमयासाथ शुद्धि चात्यन्तिकी पराम् । प्राप्नोति केवलज्ञान तथा केवलदर्शनम् ॥१०६४॥
एकत्व वितर्क अविचार ध्यान से धातिकर्म का नाश करके, अपने आत्मलाभ को प्राप्त होता है और अत्यन्त उत्कृष्ट शुद्धता को पाकर केवलज्ञान और केवल दर्शन को प्राप्त करता है।
अलम्ब पूर्व मासाद्य तबासी ज्ञानदर्शने । वेत्ति पश्यत्ति निःशेषं लोकालोकं यथास्थितम् ।।१.०६५।३ . वे ज्ञान और दर्शन दोनों अलब्धपूर्व हैं अर्थात् पहले कभी प्राप्त नहीं हुए थे
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