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अध्याय : पांचवां }
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सो उनको पाकर, उसी समय वे केवली भगवान् समस्त लोक और अलोक को यथावत् देखते और जानते हैं ।
तदा स भगवान् देवः सर्वज्ञः सर्वदोदितः ।
अनन्त सुख वीर्यादिभूतेः स्यादग्रिमं पदम् ॥१०६६॥ .
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जिस समय केवलज्ञान को प्राप्ति होती है, उस समय वे भगवान् सर्वकाल में उदयरूप सर्वज्ञ देव होते हैं और अनन्तं सुख, अनन्त वीर्य आदि विभूति के प्रथम स्थान होते हैं, वह भावमुक्त का स्वरूप है ।
इन्द्रचन्द्रार्क भोitereer नतक्रमः
विहरत्पवनी पृष्ठं स शोलेश्वर्य लाञ्छितः ॥ १०६७।।
इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, धरणेन्द्र, मनुष्य और देवों से नमस्कृत हुए हैं चरण जिनके ऐसे केवली भगवान् शील अर्थात चौरासी लाख उत्तर गुण और ऐश्वर्य सहित पृथ्वीतल में विहार करते हैं ।
उन्मुrafe freयात्वं द्रव्यभावसतं विभुः ।
बोयत्यपि निःशेषं भव्यराजीव भण्डलम् ||१०६८||
वे विभु सर्वज्ञ भगवान् पृथ्वीतल में विहार करके जीवों के द्रव्य मल और भाव मूल रूप मिथ्यात्व का जड़ से नाश करते हैं और समस्त भव्य जीव रूपी कमलों की मण्डली (समूह) को प्रफुल्लित करते हैं ।
भावार्थ -- जीवों के मिथ्यात्व को दूर करके उनको मोक्षमार्ग में लगाते हैं ।
ज्ञान लक्ष्मी तपो लक्ष्मी त्रिदशयोजिताम् ।
आत्यन्तिकीं च सम्प्राप्य धर्म चक्राधिपो भवेत् ॥१०६६॥
इस शुक्ल ध्यान के प्रभाव से ज्ञानलक्ष्मी, तपोलक्ष्मी और देवों की समवशरण लक्ष्मी तथा मोक्ष लक्ष्मी को पाकर, धर्मचक्र के चक्रवतीं होते हैं ।
कल्याचिभवं श्रीमान् सर्वाभ्युदयसूचकम् ।
समासाद्य जगद्वन्द्यं त्रैलोक्याधिपतिर्भवेत् ॥११००॥
अन्तरंग बहिरंग लक्ष्मी सहित केवली भगवान् जगत् से वन्दनीय और सब अभ्युदयों का सूचक ऐसे कल्याणरूप विभव (सम्पदा) को पाकर, सीमों लोकों के अधिपति होते हैं ।