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[ गो. प्र. चिन्तामणि
तन्नामग्रहणादेव निःशेषा जन्म रुजः । व्यादि समुद्भूता सभ्यानां यान्ति लाघवम् ॥ ११०१॥
जिन भगवान् के नाम लेने से ही भव्य जीवों के अनादि काल से उत्पन्न हुए जन्म-मरण- जन्य समस्त रोग लघु (हल्के ) हो जाते हैं ।
तदात्वं परिप्राप्य स देवः सर्वगः शिवः । जरामरण अजितः ||११०२॥
जाम
तब वे सर्वगत और शिव ऐसे भगवान् श्रहन्तपने को पाकर, सम्पूर्ण कर्मों के समूह और जरा-मरण से रहित हो जाते हैं ।
भावार्थ--अरहन्तपना पाकर सिद्ध परमेष्ठी होते हैं ।
तस्यैव परमेश्वर्यं चरण ज्ञानभवम् । ज्ञातु वक्तुमहं मन्ये योगिनामप्य गोचरम् ॥११०
आचार्य कहते हैं कि मैं ऐसा मानता हूं कि उन सर्वज्ञ भगवान् का परम ऐश्वर्य, चारित्र और ज्ञान के विभव का जानना और कहना बड़े-बड़े योगियों को भी अगोचर हैं ।
मोहेन सह दुद्धर्षे हते धाति चतुष्टये । देवस्य व्यक्ति रूपे शेषमास्ते चतुष्टयम् ।।११०४ ।।
केवली भगवान् के जब मोहनीय कर्म के साथ ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय और अन्तराय --- इन चार दुर्धर्ष घातिया कर्मों का नाश हो जाता है, तब अवशेष चार घाति कर्म व्यक्तिरूप से रहते हैं ।
सर्वज्ञः क्षीरंगकर्मासौ केवलज्ञान भास्करः ।
अलमुहले शेषास्तृतीयं ध्यानमर्हति ॥ ११०५ ॥
कर्मों से रहित और केवलज्ञान रूपी सूर्य से पदार्थों को प्रकाशित करने वाले ऐसे वे सर्वज्ञ जब अन्तर्मुहूर्त प्रमाण आयु बाकी रह जाती है, तब तीसरे सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति शुक्लध्यान के योग्य होते हैं ।
astraight शेषे संवृता ये जिनाः प्रकरण ।
ते यांfor ear शेषा भाज्या: समुद्धाले ।।११०६ ॥
जो जिनदेव उत्कृष्ट छः महीने की आयु अवशेष रहते हुए केवली हुए हैं, वे