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अध्याय : पांचवां ]
[ ४४७ अवश्य ही समुद्घात करते हैं और शेष अर्थात् जो छः महीने अधिक आयु रहते हुए केवली हुए हैं, वे समुद्घात में विकल्प रूप हैं ।
भावार्थ----उनका कोई नियम नहीं है, समुद्घात करें और न भी करें। यदायुरधिकानि स्युः कर्माणि परमेष्ठिनः । समुद्धातविधि साक्षात्यागे वारमते तदा ।।११०७॥ .
जब अरहन्त परमेष्ठी के आयुकर्म अन्तर्मुहूर्त अवशेष रह जाता है और अन्य तीनों कर्मों की स्थिति अधिक होती है, तब समुद्घात की विधि साक्षात् प्रथम ही प्रारम्भ करते हैं।
अनन्तवीर्य प्रथितप्रभावो दण्डं कपाट प्रतरं विधाय । स लोकमेनं समर्थश्चतुर्भिनिश्शेषमापूरयति क्रमेण ॥११०८॥
अनन्त वीर्य के द्वारा जिनका प्रभाव फैला हुआ है, ऐसे ये केवली भगवान् क्रम से दण्ड, कपाट, प्रतर-इन तीन क्रियाओं को तीन समय में करके चौथे समय में इन समस्त लोकों को पूरण करते हैं ।
भावार्थ-प्रात्मा के प्रदेश पहले समय में दण्डरूप लम्झे, द्वितीय समय में कपाट रूप चौड़े, तीसरे समय में प्रतर रूप मोटे होते हैं और चौथे समय में प्रदेश समस्त लोक में भर जाते हैं। इसी को लोक पूरण कहते हैं। ये सब क्रियाएँ चार समय में होती हैं !
तवा स सर्वगः सार्यः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः । विश्वव्यापी विभा विश्वमूत्ति महेश्वरः ॥१.१०६१
केवली भगवान् जिस समय लोक- पूर्ण होते हैं, उस समय उनके सर्वगत, सार्व, सर्वज्ञ, सर्वतोमुख, विश्वव्यापी, विभु, भर्ता, विश्वमूर्ति और महेश्वर--ये नाम यथार्थ (सार्थक) होते हैं।
लोकपूरणमासाद्य करोति ध्यानवीर्यतः । आयुः समानि कर्माणि मुक्तिमानीय तस्क्षरग ॥१११०॥
केवली भगवान् लोक पूरण प्रदेशों को पाकर, ध्यान के बल से वेदनीय, नाम और गोत्र-इन तीनों प्रघातिया कर्मों की स्थिति. घटाकर अर्थात् भोग में लाकर, आयुकर्म के समान स्थिति करते हैं। . . भावार्थ-यदि वेदनीय, नाम और गोत्र कों की स्थिति प्राय कर्म से