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________________ ४४८ । प्र. चिन्तामणि अधिक हो तो लोक पूरण अवस्था में उनकी स्थिति आयु कर्म की स्थिति के समान कर लेते हैं। ततः क्रमेण सेनैव स पश्चाधिनिवर्तते । लोक पूरणतः श्रीमान् चतुभिः समयः पुनः ॥११११॥ श्रीमान् केवली भगवान् पुनः लोक पूरण प्रदेशों से उसी क्रम से चार समयों में लौटकर स्वस्थ होते हैं। भावार्थ-लोक पूरण से प्रतर, कपाट, दण्डरूप होकर, चौथे समय में शरीर के समान प्रात्म प्रदेशों को करते हैं । काय योगे स्थिति कृत्वा बादरेऽचिन्त्यष्टितः । सूक्ष्मी करोति वाकञ्चित्तयोगयुग्मं स बादरम् ॥१११२॥ जिनकी चेष्टा अचिन्त्य है, ऐसे केवली भगवान् उस समय बादर कस्य योग में स्थिति करके, बादर वचनयोग और बादर मनोयोग को सूक्ष्म करते हैं । काय योगे ततस्त्यक्त्वा स्थितिमासाद्य तदये। स सूक्ष्मी कुरुते पश्चात् काय योग , बादरम् ।।१११३॥ पुनः वे भगवान् काययोग को छोड़कर, वचनयोग और मनोयोग में स्थिति करके, बादर काययोग को सूक्ष्म करते हैं । काय योगे ततः सूक्ष्मे स्थिति कृत्वा पुनः क्षणात् । योग द्वयं निगलाति सद्यो वाश्यित्तसंज्ञकम् ॥१११४॥ तत्पश्चात् सूक्ष्म काययोग में स्थिति करके, क्षणमात्र में उसी समय वचनयोग और मनोयोग दोनों का निग्रह करते हैं। सूक्ष्म क्रियं सतो ध्यान से साक्षात् ध्यातुमर्हति । सूक्ष्मैककाय योगस्थ स्मृतीयं यद्धि पठ्यते ।।१११५॥ तब यह सूक्ष्मक्रिया ध्यान को साक्षात् ध्यान करने योग्य होता है; और वह वहां पर सूक्ष्म एक काययोग में स्थित हुया उसका ध्यान करता है । यही तृतीय सुक्ष्मक्रियाऽप्रतिपाति ध्यान है।... द्वासप्तति बिलीयन्ते कर्म प्रकृतयो द्रुतम् ।. .. उपास्ये देवदेवस्य मुक्ति श्री प्रतिबन्धकाः ॥१११६॥ तदनन्तर प्रयोग गुणस्थान के उपान्त्य अर्थात् अन्त समय के पहले समय में decisitosantipur memail SAD -
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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