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अध्याय : पांचवां ]
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afra के मुक्तिरूपी लक्ष्मी की प्रतिबन्धक कर्मों की बहत्तर प्रकृति शीघ्र ही नष्ट होती हैं ।
तस्मिव क्ष साक्षादाविर्भवति निर्मलम् ।
समुच्छिन्न क्रियं ध्यानमयोग परमेष्ठिनः ॥ १११७॥
भगवान् योगी परमेष्ठी के उसी प्रयोग गुणस्थान के उपान्त्य समय में साक्षात् निर्मल ऐसा समुच्छिन्नक्रिया नामक चौथा शुक्लध्यान प्रकट होता है । विलयं वीतरागस्य पुनर्यान्ति त्रयोदश ।
श्रमं समये सद्यः पर्यन्ते या व्यवस्थिताः ।। १११८ ।।
तत्पश्चात् वीतराग प्रयोगी केवली के प्रयोग गुणस्थान के अन्त समय में शेष रही हुई तेरह कर्म प्रकृति जो कि अब तक लगी हुई थीं, तत्काल ही विलय हो जाती हैं ।
तदासौ निर्मलः शान्तो निष्कलङ्को निरामयः । जम्मआने agar arearer विच्युतः ॥ १११९॥ सिद्धात्मा सुप्रसिद्धात्मा निष्पन्नात्मा निरञ्जनः । frfoयो निष्कलः शुद्धो निर्देवकहवोऽति निर्मलः ॥ ११२०॥ ग्राविर्भूतयथास्यात चररणोऽनन्त वीर्यवान् । परां शुद्धि परिप्राप्तो हर्बोधस्य वात्मनः ॥११२१॥ . योगी व्यक्त योगत्वात्केवलोत्पाद निर्वृत्तः । साधितात्मस्वभावश्च परमेष्ठी परं प्रभुः ॥ ११२२ ॥ लघुपञ्चाक्षरोवारकालं स्थित्वा ततः परम्
स स्वभावाहजत्यूर्ध्वं शुद्धात्मा वीतबन्धनः ।।११२३॥
उस योग केवल वह गुणस्थान में केवली भगवान् निर्मल, शान्त, निष्कलङ्क निरामय और जन्म-मरण रूप संसार के अनेक दुर्निवार बन्ध के कष्टों से रहित हैं; इनका आत्मा सिद्ध, सुप्रसिद्ध और निष्पन्न हैं, तथा ये कर्म-मल रहित निरञ्जन हैं, क्रिया रहित हैं, शरीर रहित हैं, शुद्ध हैं, निर्विकल्प हैं और अत्यन्त निर्मल है; इनके यथाख्यात चारित्र प्रकट होता है प्रर्थात् चारित्र की पूर्णता हुई है; और अनन्त वीर्य सहित हैं अर्थात् अपने स्वरूप से कभी च्युत नहीं होते और ग्राम के दर्शन ज्ञान की उत्कृष्ट शुद्धता को प्राप्त हुए
हैं
तथा ये मन-वचन-काय के