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________________ ४५० ] [ गो. प्र. चिन्तामणि योगों से रहित हैं इसलिये प्रयोगी हैं, अत्यन्त निवृत्त हैं इसलिये केवल हैं; इन्होंने अपना आत्मा सिद्ध कर लिया है, इसलिए साधितात्मा हैं, तथा स्वभाव स्वरूप हैं, परमेष्ठी हैं और उत्कृष्ट प्रभु हैं; उस चौदहवें गुणस्थान में इतने समय तक रहते हैं कि जितने समय में लघु- पांच अक्षर का उच्चारण हो और फिर कर्म बन्धन से रहित वे शुद्धात्मा स्वभाव से ही ऊर्ध्वगमन करते हैं। ( ज्ञानार्णव, श्र० शुभचन्द्रस्वामी) सिद्ध भगवान * अवरोध विनिर्मुक्त लोकाग्रं समये प्रभुः । धर्माभावे ततोsप्यूर्ध्वगमनं नानुमीयते ।। ११२४॥ पश्चात् वे भगवान् उर्ध्व गमन कर एक समय में ही कर्म के अवरोध रहित लोक के अग्रभाग विषे विराजमान होते हैं । लोकाग्र भाग से श्रागे धर्मस्तिकाय का अभाव है, इसलिये इनका यागे गमन नहीं होता। यही अनुमान द्वारा दिखलाते हैं । धर्मो गतिस्वभावोऽयमधर्मः स्थिति लक्षणः । तयोर्योगात्पदार्थानां मतिस्थिती उदाहृते ॥११२५॥ जो गति स्वभाव हैं अर्थात् गमन करने में हेतु है, सो धर्मास्तिकाय है और जो स्थिति लक्षण रूप है ग्रंर्थात् पदार्थों की स्थिति में कारण है, सो प्रर्मास्तिकाय है; इन दोनों के निमित्त से पदार्थों की गति और स्थिति कही गई है। तौ लोकगमनान्तस्थौ ततो लोके गतिस्थिती | ari न तु लोकान्त मतिक्रम्यं प्रवर्तसे ।।११२६ ॥ a धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय लोक के गमन पर्यन्त स्थित हैं, इसलिये पदार्थों की गति और स्थिति लोक में ही होती है; लोक का उल्लंघन करके नहीं होती, इसलिये भगवान् लोकाग्रभाग तक ही गमन करते हैं । स्थिति मसाध सिद्धात्मा तत्र लोकाग्र मन्दिरे । प्रास्ते स्वभाव जानन्त गुणैश्वर्योपलक्षितः ॥ ११२७॥ सिद्धात्मा उस लोकाग्रमन्दिर में स्थिति पाकर, स्वभाव से उत्पन्न हुए अनन्व गुल और ऐश्वर्य सहित विराजमान रहते हैं। trafai fretatघ मत्यक्षं स्व स्वभावजम् । यत्सुखं देव वेवस्य तद्वय केन पार्यते ॥ ११२८।।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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