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अध्याय : पांचवां ]
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सिद्धात्मा देवाधिदेव का जो अत्यन्त बाधा रहित, अतीन्द्रिय और अपने स्वभाव से ही उत्पन्न सुख है, उसका वर्णन कौन कर सकता है ? तथाप्युद्दशतः किञ्चन् श्रीवोभि सुख लक्षणम् ।
निष्ठतार्थस्य सिद्धस्य सर्वद्वन्द्वाति वत्तिनः ।।११२६॥ श्राचार्य कहते हैं कि जिसके समय
हो चुके हैं और सुख के घातक ऐसे समस्त द्वन्द्रों से जो रहित है ऐसे सिद्ध भगवान के सुख को यद्यपि कोई नहीं कह सकता तथापि मैं नाममात्र से किञ्चित कहता हूँ ।
ये देवमनुजाः सर्वे सौख्यनाक्षार्थ सम्भवम् ।
निविशन्ति निराबाधं सर्वाक्षत्र नक्षमम् ॥ ११३०॥
सर्वेण कालेन यन्त्र भुक्तं महद्धिकम् ।
भाविनो यच भोक्ष्यन्ति स्वादिष्ठं स्वान्तरञ्जकम् ||११३१|| अनन्तगुणितं तस्मादत्यक्षं स्वस्वभावजम् ।
एकस्मिन् समये भुङ्क्ते तत्सुखं परमेश्वरः ॥ ११३२॥
जो समस्त देव और मनुष्य इन्द्रियों के विषयों से उत्पन्न और इन्द्रियों तृप्त करने में समर्थं ऐसे निराबाध सुख को वर्तमान काल में भोगते हैं तथा सबने अतीत काल में जो सुख भोगे हैं और जो सुख महाऋद्धियों से उत्पन्न हुए हैं तथा स्वादिष्ट और मन को प्रसन्न करने वाले जो सुख प्रागामी काल में भोगे जायेंगे उन समस्त सुखों से अनन्त गुणे प्रतीन्द्रिय और अपने बचाव से उत्पन्न होने वाले सुख को श्री सिद्ध भगवान् परमेश्वर एक ही समय में भोगते हैं । .
free front शेष द्रव्य पर्याय सङ्कलम् ।
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जनस्फुरति बोधार्के युगपद्योगिनां पतेः ॥ ११३३॥
योगीश्वरों के पति श्री सिद्ध भगवान के ज्ञान रूपी सूर्य में भूत, भविष्यत्, वर्तमान तीनों काल सम्बन्धी समस्त द्रव्य पर्यायों से व्याप्त हैं जो यह जगत् है सो एक ही समय में स्पष्ट प्रत्यक्ष प्रतिभासित होता है ।
भावार्थ- इन्द्रिय ज्ञान तुच्छ है, उससे उत्पन्न हुआ सुख कितना हो सकता है; सिद्ध भगवान के एक ही समय में समस्त पदार्थों का ज्ञान होता है; इसलिये उनके सुख की क्या महिमा ? सुख का कारण ज्ञान है; जहाँ पूर्ण ज्ञान है, वहाँ पूर्ण सुख भी है।