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________________ ४५२ ] [ मो. प्र. चिन्तामणि सर्वतोऽन्समाकाश लोकेतर विकल्पितम् । तस्मिन्नपि घनीभूय यस्य ज्ञान व्यवस्थितम् ॥११३४॥ यह आकाश सर्वतः अनन्त है और उसके लोक और अलोक ऐसे दो भेद हैं; उस समस्त श्राकाश में सिद्ध परमेष्ठी का ज्ञान धनीभूत हो कर भरा हुआ है। निद्रा तन्द्रा भय भ्रान्ति राग धात्ति संशयः। शोक मोह जरा जन्म मरणाचं श्च विच्युतः ।।११३५॥ श्री सिद्ध भगवान् निद्रा, तन्द्रा, भय, भ्रान्ति, राग, द्वेष पीड़ा और संशय से रहित हैं तथा शोक, मोह, जरा, जन्म और मरण इत्यादिक से रहित हैं। क्षुत्तटु श्रममदोन्माद मूर्छा मात्सर्य वजिसः । वृद्धि ह्रास व्यतीतास्मा कल्पनातीत वैभवः ॥११३६॥ और क्षुधा, तृषा, खेद, मद, उन्माद, मूर्छा और मत्सर भावों सेरहित हैं और न इनकी प्रात्मा में वृद्धि हास (घटना-बढ़ना) है और इनका विभव कल्पनातीत है । निष्कलः करणातीतो निर्विकल्पो निरञ्जनः । अनन्त बोर्यतापन्नो नित्यानन्दाभिनन्वितः ।।११३७॥ सिद्ध भगवान् शरीर रहित हैं, इन्द्रिय रहित हैं, मन के विकल्पों से रहित हैं, निरञ्जन हैं अर्थात् जिनके नये कर्मों का बंध नहीं है; अनन्त वीर्यता तो प्राप्त हुए हैं अर्थात् अपने स्वभाव से कभी च्युत नहीं होते और नित्य प्रानन्द से प्रानन्दरूप हैं अर्थात् जिनके सुख का कभी विच्छेद नहीं होता। परमेष्ठी परं ज्योतिः परिपूर्ण: सनातनः । संसारसागरोत्तीर्णः कृत कृत्योऽचल स्थितिः ॥११३८।। तथा परमेष्ठी (परम पद में विराजमान), परं ज्योतिः (जान प्रकाश रूप) परिपूर्ण सनातन (नित्य), संसार रूपी समुद्र से उत्तीर्ण अर्थात् संसार सम्बन्धी चेष्टाओं से रहित, कृत कृत्य (जिनको करना कुछ शेष नहीं है), अचलस्थिति (प्रदेशों की क्रियाओं से रहित) ऐसे सिद्ध भगवान हैं। संतृत्तः सर्वदेवास्ते देवस्त्रोलोक्यमूर्दनि । नोपमेयं मुखादीनां विक्षते परमेष्ठिनः ॥११३६।। पुनः सिद्ध भगवान् संतृप्त है, तृष्णा रहित हैं, तीन लोक के शिखर पर सदा विराजमान हैं अर्थात् गमन रहित हैं, इस संसार में कोई भी ऐसा पदार्थ नहीं है, - REMEMADEKumemomsenimammer
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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